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नज़्म
मजीद अमजद
नज़्म
कुल्फ़त-ए-ज़ीस्त से इंसान परेशाँ ही सही
ज़ीस्त आशोब-ए-ग़म-ए-मर्ग का तूफ़ाँ ही सही
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
नज़्म
कुछ लोग ये कहते हैं कि अच्छा या बुरा कुछ भी नहीं है
तक़रीब-ए-विलादत हो या हंगाम-ए-दम-ए-मर्ग