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नज़्म
सब्र का फल लोग कहते हैं मिलेगा एक दिन
आह कब तक इंतिज़ार-ए-वा'दा-ए-फ़र्दा करूँ
जगदीश सहाय सक्सेना
नज़्म
फ़र्दा महज़ फ़ुसूँ का पर्दा, हम तो आज के बंदे हैं
हिज्र ओ वस्ल, वफ़ा और धोका सब कुछ आज पे रक्खा है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
रोज़ मुझ को वा'दा-ए-फ़र्दा पे जो टरख़ाए है
मैं तिरी चालों को समझूँ हूँ मुझे बहलाए है
ज़रीफ़ जबलपूरी
नज़्म
जो वादा-ए-फ़र्दा पर अब टल नहीं सकते हैं
मुमकिन है कि कुछ अर्सा इस जश्न पे टल जाएँ
साहिर लुधियानवी
नज़्म
आँख हैराँ रूह-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा बेताब है
ये हमारे ख़्वाब की ता'बीर है ये ख़्वाब है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
इफ़्फ़त ज़ेबा काकोरवी
नज़्म
सर्द शाख़ों में हवा चीख़ रही है ऐसे
रूह-ए-तक़्दीस-ओ-वफ़ा मर्सियाँ-ख़्वाँ हो जैसे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
वा'दा-ए-क़ुर्ब ख़ुदा जाने वफ़ा हो कि न हो
वस्ल का सोच के ही जान पे बन आती है