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नज़्म
हिन्द हो या पाक हो या रूस हो या बहर-ए-रुम
जिस तरफ़ उठती हैं नज़रें हैं वहाँ फ़ित्नों की धूम
नज़ीर फ़तेहपूरी
नज़्म
ख़्वाह छोटी ज़ात का बंदर है या ढब्बूस है
जिस ने भेजा है ख़ला में उस को वो तो रूस है
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
और दौर-ए-हाल के हालात के हैं तर्जुमाँ
बल्कि कह सकते हैं इन को क़ौम के रूह-ए-रवाँ