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नज़्म
इक़बाल सुहैल
नज़्म
किवाड़ों पर जमी काई किसी की दस्तकों से साफ़ होनी है
नहीं मा'लूम कितने दिन हमारी रात होनी है
सैफ़ अली
नज़्म
नज़र आए रज़ा-कारान-ए-नीली-पोश सफ़-दर-सफ़
मिरे दिल में सुरूर उतरा मिरी आँखों में नूर आया
ज़फ़र अली ख़ाँ
नज़्म
दिल पहाड़ों पर चला जाए कि मैदानों में हो
भीड़ में लोगों की या ख़ाली शबिस्तानों में हो