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नज़्म
क़ुमरियाँ मीठे सुरों के साज़ ले कर आ गईं
बुलबुलें मिल-जुल के आज़ादी के गुन गाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
वरक़ तारीख़ ने तेज़ी से उल्टे
तग़य्युर ले के साज़-ओ-बर्ग-ए-ता'मीर-ए-जहाँ आया
ज़किया सुल्ताना नय्यर
नज़्म
कश्मकश सी कश्मकश में है मज़ाक़-ए-आशिक़ी
कामराँ सी कामराँ हर सई-ए-इमकानी है आज
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मता-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी पैमाना ओ बरबत
मैं ख़ुद को इन खिलौनों से भी अब बहला नहीं सकता
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
वो जश्न-ए-ऐश-ओ-राहत वो साज़-ए-लुत्फ़-ओ-इशरत
आँखों में फिर रहे हैं अब तक वही ज़माने
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
ख़ुदी का ज़ख़मा है मिज़राब-ए-साज़-ए-कौन-ओ-मकाँ
ख़ुदी का साज़ ग़ज़ल-ख़्वाँ नहीं तो कुछ भी नहीं
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
दिल के दाग़ों को समझ लूँ किस तरह गुलहा-ए-तर
ग़म से कैसे साज़-ओ-सामान-ए-ख़ुशी पैदा करूँ