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नज़्म
जमील मज़हरी
नज़्म
बे-तेरे क्या वहशत हम को, तुझ बिन कैसा सब्र ओ सुकूँ
तू ही अपना शहर है जानी तू ही अपना सहरा है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
हैं तज़्किरे में कुछ ऐसे नुक़ूश-ए-फ़िक्र-ए-जमील
गुबार-ए-ख़ातिर-ओ-ख़ुतबात की सजें क़िंदील
सईद आरिफ़ी
नज़्म
किसी आशिक़ की हसीं याद का है अक्स-ए-जमील
किसी काग़ज़ पे मुसव्विर के ख़यालों का जमाल
सिकंदर इरफ़ान
नज़्म
फ़िक्र-ए-मानूस पे ज़ाहिर है हर इक ख़्वाब-ए-जमील
और हर ख़्वाब से मिलता है तुझे कितना सुकूँ
हसन नईम
नज़्म
ख़ुशनुमा झीलों में लर्ज़ां जिन का है अक्स-ए-जमील
उन हसीं महलों का नक़्शा देखने आया हूँ मैं