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नज़्म
किया क्या ऐ सदा तू ने बता आ कर ज़माने में
गुज़ारी ज़िंदगी सारी फ़क़त पीने-पिलाने में
सदा अम्बालवी
नज़्म
नहीं मुमकिन मिटाना मुझ को मिस्ल-ए-नक़श-ए-पा यारो
ख़लाओं में रहूँगा गूँजता बन कर सदा यारो
सदा अम्बालवी
नज़्म
राज़-ए-क़ुदरत हमें समझाया है इक गुल ने 'सदा'
गुल नए खिलते रहें इस लिए झर जाता है गुल
सदा अम्बालवी
नज़्म
यूँ फ़ज़ाओं में रवाँ है ये सदा-ए-दिल-नशीं
ज़ेहन-ए-शाइर में हो जैसे इक अछूता सा ख़याल
इब्न-ए-सफ़ी
नज़्म
नींद की गोद में ज़माना है, बेड़ियाँ तोड़ दूँ, निकल जाऊँ
वादी-ए-हू में जा के खो जाऊँ
इफ़्तिख़ार आज़मी
नज़्म
वही सितारे हैं, मगर कहाँ वो माहताब-ए-हिन्द
वही है अंजुमन, मगर कहाँ वो सद्र-ए-अंजुमन
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
क़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूर
और बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये फ़ल्सफ़ा-गर सदा-ओ-आहंग-ओ-हर्फ़-ओ-मा'नी को ज़ख़्म दे कर लहू का कच्चा खुरनड दाँतों से नोचते हैं
कामरान नफ़ीस
नज़्म
फ़लसफ़े की ख़ूबसूरत तर्जुमानी तू ने की
दश्त-ए-हू में आँसुओं से बाग़बानी तू ने की