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नज़्म
मैं होंटों पे थूक देती हूँ
लेकिन सदक़ा-ए-जारीया का सुर्ख़ रुमाल उँगली पे नहीं बाँध सकती
सिदरा सहर इमरान
नज़्म
है मुसलमानों पर वाजिब सदक़ा-ए-ईद-उल-फ़ित्र
पा के रोज़ी ख़ुश हैं ग़ुरबा ये निहाल-ए-ईद है
निसार कुबरा अज़ीमाबादी
नज़्म
नहीं मुमकिन मिटाना मुझ को मिस्ल-ए-नक़श-ए-पा यारो
ख़लाओं में रहूँगा गूँजता बन कर सदा यारो
सदा अम्बालवी
नज़्म
किया क्या ऐ सदा तू ने बता आ कर ज़माने में
गुज़ारी ज़िंदगी सारी फ़क़त पीने-पिलाने में
सदा अम्बालवी
नज़्म
राज़-ए-क़ुदरत हमें समझाया है इक गुल ने 'सदा'
गुल नए खिलते रहें इस लिए झर जाता है गुल
सदा अम्बालवी
नज़्म
यूँ फ़ज़ाओं में रवाँ है ये सदा-ए-दिल-नशीं
ज़ेहन-ए-शाइर में हो जैसे इक अछूता सा ख़याल
इब्न-ए-सफ़ी
नज़्म
मरेंगे जान देंगे ग़म सहेंगे जेल जाएँगे
मगर ऐ 'ज़ाहिदा' अब जश्न-ए-आज़ादी मनाएँगे