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नज़्म
झेले हुए दिनों को हम आज भी नहीं भूले
बहुत सैंत कर रखी हैं हम ने उन वक़्तों की यादें
अज़रा अब्बास
नज़्म
फिर ख़मोशी की कठाली में सभी यादें उंडेल
सैंत कर दिल के निहाँ-ख़ाने से लाऊँ मैं भी
मोहम्मद ज़ुबैर ख़ालिद
नज़्म
उसे सैंत कर ताक़चे में सजा लो
ख़लाओं के यख़-बस्ता बे-नूर पाताल में ये सितारा तुम्हारा सहारा बनेगा