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नज़्म
एक बोसीदा हवेली यानी फ़र्सूदा समाज
ले रही है नज़अ के आलम में मुर्दों से ख़िराज
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
ये डर है मैं जो बड़ा हो के भी रहा जाहिल
न मार दे मेरे मुँह पर समाज दो थप्पड़
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
साँझ समाज हेच हैं रिश्ता-ए-ख़ूँ भी कुछ नहीं
हसरत व आरज़ू की नय बंदिश व बस्तगी की लय
अख़्तर उस्मान
नज़्म
भय्या के आदर्शों को कभी भुला न पाया मैं
पर अब जो मैं देख रहा हूँ समाज में बस्ते लोगों को