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नज़्म
रथ के पहिए के तले देखा तड़प कर इसे ठंडा होते!
ख़ुद-कशी थी? वो समर्पण था? वो दुर्घटना थी?
गुलज़ार
नज़्म
तुर्क-ए-शीराज़ हो तुम हाफ़िज़-ए-शीराज़ हूँ मैं
अब समरक़ंद-ओ-बुख़ारा है तुम्हारी ख़ातिर
अंजुम आज़मी
नज़्म
बूँद लहू की एक रगों में तन भी एक समान
प्रेम पाठ पढ़ाया सब ने गीता हो या पुराण
मोहम्मद हाज़िम हस्सान
नज़्म
तोड़ फोड़ कर द्वार धनुष सब कर दे एक समान
मन-मंदिर में बस न सके तो मत कहला भगवान