aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "sameto"
मुझे समेटोमैं रेज़ा रेज़ा बिखर रहा हूँन जाने मैं बढ़ रहा हूँया अपने ही ग़ुबार-ए-सफ़र में हर पल उतर रहा हूँन जाने मैं जी रहा हूँया अपने ही तराशे हुए नए रास्तों की तन्हाइयों में हर लहज़ा मर रहा हूँ
अच्छा देखो मुँह न बिसोरोसारी चीज़ें आ के समेटो
कटती नहीं सर्द रातढलती नहीं ज़र्द रातरात जुदाई की रातख़ाली गिलासों की सम्ततकती हुई आँख मेंक़तरा-ए-शबनम नहींकौन लहू में बहेमेरी रगों में चलेतेज़ हो साँसों का शोरजलने लगे पोर पोरआए समुंदर में जोशगिर पड़े दीवार-ए-होशसूखी हुई शाख़ परबर्ग ओ समर खिल उठींआओ मिरी नींद कीबिखरी हुई पत्तियाँआज समेटो ज़राकब से खुला है बदनइस को लपेटो ज़राएक शिकन दो शिकनबिस्तर-ए-तन्हाई परफिर से बढ़ा दो ज़रामुझ को रुला दो ज़राएक पहर रात हैरात जुदाई की रात
हमें जवानी में मौत आएगीभीगते तकिए के सर्द सीने पेअपनी साँसों में गर्म बाँहों की प्यास ले कर सुलगने वालीहर एक दोशीज़ा जानती हैकि आँख जब ख़्वाब के सहीफ़े को चाट ले गीतो नूह कैप्सूल से पुकारेगाप्यारे बेटे, अमाँ में आओलो, मैं ने जो क़ब्र उम्र के बेलचे से अपने लिए बनाई हैउस की रानों मेंतुम भी अपना बदन समेटोतुम्हारे एक हाथ चाँद और दूसरे पे सूरजकि मस्लहत की क्रेज़ क़ाएम रहेग्लैमर तुम्हारे कॉलर में फूल बन कर खिलेऐ बेटे, ये शहर उर्यानियों में नुचड़ेगाऔर इस पर अज़ाब दाइम है
समेटो इन बिखरती साअ'तों कोबंद मुट्ठी खोल कर आज़ाद कर दोसारी सम्तों कोनिगाहों की हदों से सब मनाज़िर हटते जाते हैंसराबों के समुंदर के किनारे कटते जाते हैंसराबों के समुंदर के मुसाफ़िर छोटी छोटी टुकड़ियों में बटते जाते हैंहवा के होंट इन अल्फ़ाज़ को दोहराते जाते हैंसमेटो इन बिखरती साअ'तों कोबंद मुट्ठी खोल कर आज़ाद कर दोसारी सम्तों को
मैं सुन रहा हूँ ख़ुद अपनी आवाज़ में ये जुमलाकि मैं तो तुम तक पहुँच गया था गुज़िश्ता शबचाँद के निकलने से पेश-तर हीलिबास उतरे हुए बदन परमिरी रगों से उमडता मेरा लहूतो तुम ने ज़रूर देखा है, काली देवीवो हड्डियाँ जिन से गोश्त नोचा गया था मेरासपीद जैसे धुली हुई हों!उठो मिरे ला-शुऊर में बैठी काली-देवीमुझे समेटो सियाह बाहोँ में आगे आ करकि मैं ने ये बंदगी इताअतख़ुद अपनी मर्ज़ी से, अपने दिल से क़ुबूल की हैमिरा लहू, मेरी हड्डियाँ, मेरा गोश्तहत्ता कि रूह मेरीतुम्हें समर्पण है, मेरी देवी
तुम्हें ये उज़्र हैतुम को जो दी गई है ज़मींवो मुख़्तसर है बहुतजो बाज़ुओं में समेटो तो वो सिमट जाएइसी लिए हो तुम एहसास-ए-कम-तरी का शिकारऔर उन को कितनी इरादत से देखते होजिन्हेंज़मीं मिली है हुदूद-ए-निगाह से भी बहुत दूर दूर फैली हुई
ये बे-नूर अंधी सियासत का बाज़ार हैमस्लहत की दुकाँ हैशनासा यहाँ अजनबी हैंमसर्रत के लम्हे भी बे-जान हैंजिस्म-ओ-जाँ की हक़ीक़त नहीं हैंरिया-कार सोचों केजामिद हिसारों में लिपटी हुईसर-ज़मीन कह रही हैकि ये महफ़िल-ए-तंग-दामाँ हैसाक़ी का ए'जाज़मुतरिब की आवाज़और नारा-ए-सरमदी कुछ नहीं है यहाँतो बसज़ौक़-ए-हस्ती काबेदारी-ए-आरज़ू का असासा समेटोउन्हीं बे-नवाई के ग़ारों में खो जाओ जा करजहाँ कोने कोने मेंहर कुंज में हर-क़दम परसुकूत-ए-मुकम्मल का आसेब हैशोर-ओ-ग़ौग़ा का जंगल हैऔर गुलशन-ए-नुत्क़ बर्ग-ओ-बार-ओ-समर हैकि इस महबस-ए-फ़िक्र में ख़यालों की महशर-ख़िरामीअँधेरों उजालों की तकरार-ए-पैहम नहीं हैइसी कुंज-ए-बे-गाँगी में छुपा लो दिल-ओ-जाँजहाँ सहर-ख़ेज़ बेदार रूहेंकभी नश्शा-ए-मय से सरशार थीं जोख़ुमार-ए-तमन्ना गँवा करसुबुक-नर्म-ख़्वाबों से दामन बचा करकार-गाह-ए-हुनर से निगाहें चुरा करज़माने के नक़्श-ए-क़दम देखते देखतेसो गई हैंकि वो बार-ए-हुर्रियत दीन-ओ-दिल सेसुबुक-बार सी हो गई हैंअगर जान-ओ-दिल फिर भीबेदारी-ए-आरज़ूफ़ित्ना-साज़ी-ए-हक़-बीनी-ओ-गर्म-रफ़्तारी-ए-जुस्तजू पर मुसिर हूँतो दीवार-ए-महबस के रौज़न को आँखें बना लोनिगाहें उफ़ुक़ पर जमा लो
ये मेरा कमरामिरे बुज़ुर्गों का एक तोहफ़ाविरासतों का रिवायतों का इनायतों काअज़ीम वारिसपुरानी यादों पुरानी बातों पुरानी क़द्रों काइक अतिय्याअगरचे नक़्श-ओ-निगार इस केग़म-ए-ज़माना की आँधियों सेवो रंग-ओ-रोग़न वो कैफ़-ओ-मस्तीहर एक ख़ूबी को खो चुके हैंमगर है फिर भी अज़ीज़ मुझ कोहर एक दीवार अब है ख़स्ताहर एक मेहराब है शिकस्तावो फ़र्श जिस पर किसी ज़माना में फ़र्श-ए-मख़मल बिछा हुआ थामगर कोई मह-जबीं थिरक करये गा रही थीफ़र्श-ए-मख़मल पे मिरे पाँव छिले जाते हैंन फ़र्श-ए-मख़मल न पा-ए-नाज़ुकचटाइयाँ कुछ बिछी हुई हैंजहाँ पे फ़ानूस जल रहा थावहाँ पे अब इक दिया है रौशनजो शाम ही से बुझा बुझा साचराग़-ए-मुफ़्लिस की तरह यारोसिसक रहा हैये मेरा कमरामिरे बुज़ुर्गों का एक तोहफ़ामैं सोचता हूँ मैं जानता हूँकि इस की बुनियाद क्यों पड़ी थीमैं देखता हूँकि अब भी बाक़ी हैं इस फ़ज़ा मेंपुरानी तहज़ीब के पुजारीवही रिवायात-ए-शहरयारीवही है जंग-ए-ग़ुरूर जारीमैं सोचता हूँ कि इन रिवायात के धुँदलकों से कैसे निकलूँमिरे लहू की तमाम गर्दिशमिरी ज़बाँ का हर एक जुमलामिरी नज़र का हर एक मंज़रमिरे बदन की हर एक लग़्ज़िशये चाहती है कि इस रिवायत के मक़बरे कोकिसी जहन्नुम में फेंक आऊँमगर मैं फिर सोचता हूँ यारोकि हर महीने की बीस तारीख़ ही से कहती है दिल की धड़कनकि हाथ रोकोज़रूरतों की रिदा समेटोनहीं तो चादर से पाँव बाहर निकल पड़ेंगेये मशवरे दिल के हों तो सोचोनया मकाँ किस तरह बनेगानहीं नहीं मैं नहीं गिराउँगा शहरयारों के इस खंडर कोकि सर छुपाने के वास्ते अब कहीं जगह भी न मिल सकेगीये मेरा कमरामिरे बुज़ुर्गों का एक तोहफ़ामैं इस का वारिस ये मेरा वारिस
चलो जल्दी समेटो सबतुम्हारे ख़ाक में मिलने का मौसम आन पहुँचा है
चलो अब समेटो खिलौनेकिताबें निकालोये क्या ढेर तुम ने लगाया हुआ है फटे काग़ज़ों काउधेड़ी हुई डोल्फ़िन माँ ने देखी तो कूटेगीआँसू बहाते हुए तुममिरे पास आओगेलेकिन मैं सहमी हुईमाँ की अँगारा-आँखों से आँखें चुराऊँगीमिट्टी कुरेदूँगी पाँव के नाख़ुन सेहाथों के नाख़ुन कतरते हुए अपने दाँतों सेमैं ने कई बार देखा है तुमउस की झोली में छुप कर मिरा मुँह चढ़ाते होचोरी किए उस के पैसों का इमचोर खाते होपानी टपकता है होंटों से मेरेतो माँ डाँटती हैदुपट्टा उड़ाती हैजाने वो क्या बड़बड़ाती हैकलमोही कहती है किस कोमुझे उस ने अब तक बताया नहीं हैकि खट्टी ज़बानों पे शीरीनी रक्खो तोउबकाई मछली की मानिंद बाहर लपकती है क्यूँख़ैर छोड़ो मुझेतुम फटी डोल्फ़िन सँभालो!
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमाराहम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमाराग़ुर्बत में हों अगर हम रहता है दिल वतन मेंसमझो वहीं हमें भी दिल हो जहाँ हमारापर्बत वो सब से ऊँचा हम-साया आसमाँ कावो संतरी हमारा वो पासबाँ हमारागोदी में खेलती हैं इस की हज़ारों नदियाँगुलशन है जिन के दम से रश्क-ए-जिनाँ हमाराऐ आब-रूद-ए-गंगा वो दिन है याद तुझ कोउतरा तिरे किनारे जब कारवाँ हमारामज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखनाहिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारायूनान ओ मिस्र ओ रूमा सब मिट गए जहाँ सेअब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमाराकुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारीसदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा'इक़बाल' कोई महरम अपना नहीं जहाँ मेंमालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहाँ हमारा
ये मिलें ये जागीरेंकिस का ख़ून पीती हैंबैरकों में ये फ़ौजेंकिस के बल पे जीती हैंकिस की मेहनतों का फलदाश्ताएँ खाती हैंझोंपड़ों से रोने कीक्यूँ सदाएँ आती हैंजब शबाब पर आ करखेत लहलहाता हैकिस के नैन रोते हैंकौन मुस्कुराता हैकाश तुम कभी समझोकाश तुम कभी समझोकाश तुम कभी जानोदस करोड़ इंसानो!इल्म-ओ-फ़न के रस्ते मेंलाठियों की ये बाड़ेंकॉलिजों के लड़कों परगोलियों की बौछाड़ेंये किराए के गुंडेयादगार-ए-शब देखोकिस क़दर भयानक हैज़ुल्म का ये ढब देखोरक़्स-ए-आतिश-ओ-आहनदेखते ही जाओगेदेखते ही जाओगेहोश में न आओगेहोश में न आओगेऐ ख़मोश तूफ़ानो!दस करोड़ इंसानो!
अच्छा मेरा ग़म न भुलाओमेरा ग़म हर ग़म में समोलोइस से अच्छी बात न होगीये तो तुम्हें मंज़ूर है बोलो
नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्ताँ मेरीख़मोशी गुफ़्तुगू है बे-ज़बानी है ज़बाँ मेरीये दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी है कैसा तेरी महफ़िल मेंयहाँ तो बात करने को तरसती है ज़बाँ मेरीउठाए कुछ वरक़ लाले ने कुछ नर्गिस ने कुछ गुल नेचमन में हर तरफ़ बिखरी हुई है दास्ताँ मेरीउड़ा ली क़ुमरियों ने तूतियों ने अंदलीबों नेचमन वालों ने मिल कर लूट ली तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ मेरीटपक ऐ शम्अ आँसू बन के परवाने की आँखों सेसरापा दर्द हूँ हसरत भरी है दास्ताँ मेरीइलाही फिर मज़ा क्या है यहाँ दुनिया में रहने काहयात-ए-जावेदाँ मेरी न मर्ग-ए-ना-गहाँ मेरीमिरा रोना नहीं रोना है ये सारे गुलिस्ताँ कावो गुल हूँ मैं ख़िज़ाँ हर गुल की है गोया ख़िज़ाँ मेरीदरीं हसरत सरा उमरीस्त अफ़्सून-ए-जरस दारमज़ फ़ैज़-ए-दिल तपीदन-हा ख़रोश-ए-बे-नफ़स दारमरियाज़-ए-दहर में ना-आश्ना-ए-बज़्म-ए-इशरत हूँख़ुशी रोती है जिस को मैं वो महरूम-ए-मसर्रत हूँमिरी बिगड़ी हुई तक़दीर को रोती है गोयाईमैं हर्फ़-ए-ज़ेर-ए-लब शर्मिंदा-ए-गोश-ए-समाअत हूँपरेशाँ हूँ मैं मुश्त-ए-ख़ाक लेकिन कुछ नहीं खुलतासिकंदर हूँ कि आईना हूँ या गर्द-ए-कुदूरत हूँये सब कुछ है मगर हस्ती मिरी मक़्सद है क़ुदरत कासरापा नूर हो जिस की हक़ीक़त मैं वो ज़ुल्मत हूँख़ज़ीना हूँ छुपाया मुझ को मुश्त-ए-ख़ाक-ए-सहरा नेकिसी को क्या ख़बर है मैं कहाँ हूँ किस की दौलत हूँनज़र मेरी नहीं ममनून-ए-सैर-ए-अरसा-ए-हस्तीमैं वो छोटी सी दुनिया हूँ कि आप अपनी विलायत हूँन सहबा हूँ न साक़ी हूँ न मस्ती हूँ न पैमानामैं इस मय-ख़ाना-ए-हस्ती में हर शय की हक़ीक़त हूँमुझे राज़-ए-दो-आलम दिल का आईना दिखाता हैवही कहता हूँ जो कुछ सामने आँखों के आता हैअता ऐसा बयाँ मुझ को हुआ रंगीं-बयानों मेंकि बाम-ए-अर्श के ताइर हैं मेरे हम-ज़बानों मेंअसर ये भी है इक मेरे जुनून-ए-फ़ित्ना-सामाँ कामिरा आईना-ए-दिल है क़ज़ा के राज़-दानों मेंरुलाता है तिरा नज़्ज़ारा ऐ हिन्दोस्ताँ मुझ कोकि इबरत-ख़ेज़ है तेरा फ़साना सब फ़सानों मेंदिया रोना मुझे ऐसा कि सब कुछ दे दिया गोयालिखा कल्क-ए-अज़ल ने मुझ को तेरे नौहा-ख़्वानों मेंनिशान-ए-बर्ग-ए-गुल तक भी न छोड़ उस बाग़ में गुलचींतिरी क़िस्मत से रज़्म-आराइयाँ हैं बाग़बानों मेंछुपा कर आस्तीं में बिजलियाँ रक्खी हैं गर्दूं नेअनादिल बाग़ के ग़ाफ़िल न बैठें आशियानों मेंसुन ऐ ग़ाफ़िल सदा मेरी ये ऐसी चीज़ है जिस कोवज़ीफ़ा जान कर पढ़ते हैं ताइर बोस्तानों मेंवतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली हैतिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों मेंज़रा देख उस को जो कुछ हो रहा है होने वाला हैधरा क्या है भला अहद-ए-कुहन की दास्तानों मेंये ख़ामोशी कहाँ तक लज़्ज़त-ए-फ़रियाद पैदा करज़मीं पर तू हो और तेरी सदा हो आसमानों मेंन समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालोतुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों मेंयही आईन-ए-क़ुदरत है यही उस्लूब-ए-फ़ितरत हैजो है राह-ए-अमल में गामज़न महबूब-ए-फ़ितरत हैहुवैदा आज अपने ज़ख़्म-ए-पिन्हाँ कर के छोड़ूँगालहू रो रो के महफ़िल को गुलिस्ताँ कर के छोड़ूँगाजलाना है मुझे हर शम-ए-दिल को सोज़-ए-पिन्हाँ सेतिरी तारीक रातों में चराग़ाँ कर के छोड़ूँगामगर ग़ुंचों की सूरत हूँ दिल-ए-दर्द-आश्ना पैदाचमन में मुश्त-ए-ख़ाक अपनी परेशाँ कर के छोड़ूँगापिरोना एक ही तस्बीह में इन बिखरे दानों कोजो मुश्किल है तो इस मुश्किल को आसाँ कर के छोड़ूँगामुझे ऐ हम-नशीं रहने दे शग़्ल-ए-सीना-कावी मेंकि मैं दाग़-ए-मोहब्बत को नुमायाँ कर के छोड़ूँगादिखा दूँगा जहाँ को जो मिरी आँखों ने देखा हैतुझे भी सूरत-ए-आईना हैराँ कर के छोड़ूँगाजो है पर्दों में पिन्हाँ चश्म-ए-बीना देख लेती हैज़माने की तबीअत का तक़ाज़ा देख लेती हैकिया रिफ़अत की लज़्ज़त से न दिल को आश्ना तू नेगुज़ारी उम्र पस्ती में मिसाल-ए-नक़्श-ए-पा तू नेरहा दिल-बस्ता-ए-महफ़िल मगर अपनी निगाहों कोकिया बैरून-ए-महफ़िल से न हैरत-आश्ना तू नेफ़िदा करता रहा दिल को हसीनों की अदाओं परमगर देखी न उस आईने में अपनी अदा तू नेतअस्सुब छोड़ नादाँ दहर के आईना-ख़ाने मेंये तस्वीरें हैं तेरी जिन को समझा है बुरा तू नेसरापा नाला-ए-बेदाद-ए-सोज़-ए-ज़िंदगी हो जासपंद-आसा गिरह में बाँध रक्खी है सदा तू नेसफ़ा-ए-दिल को क्या आराइश-ए-रंग-ए-तअल्लुक़ सेकफ़-ए-आईना पर बाँधी है ओ नादाँ हिना तू नेज़मीं क्या आसमाँ भी तेरी कज-बीनी पे रोता हैग़ज़ब है सत्र-ए-क़ुरआन को चलेपा कर दिया तू नेज़बाँ से गर किया तौहीद का दावा तो क्या हासिलबनाया है बुत-ए-पिंदार को अपना ख़ुदा तू नेकुएँ में तू ने यूसुफ़ को जो देखा भी तो क्या देखाअरे ग़ाफ़िल जो मुतलक़ था मुक़य्यद कर दिया तू नेहवस बाला-ए-मिम्बर है तुझे रंगीं-बयानी कीनसीहत भी तिरी सूरत है इक अफ़्साना-ख़्वानी कीदिखा वो हुस्न-ए-आलम-सोज़ अपनी चश्म-ए-पुर-नम कोजो तड़पाता है परवाने को रुलवाता है शबनम कोज़रा नज़्ज़ारा ही ऐ बुल-हवस मक़्सद नहीं उस काबनाया है किसी ने कुछ समझ कर चश्म-ए-आदम कोअगर देखा भी उस ने सारे आलम को तो क्या देखानज़र आई न कुछ अपनी हक़ीक़त जाम से जम कोशजर है फ़िरक़ा-आराई तअस्सुब है समर उस काये वो फल है कि जन्नत से निकलवाता है आदम कोन उट्ठा जज़्बा-ए-ख़ुर्शीद से इक बर्ग-ए-गुल तक भीये रिफ़अत की तमन्ना है कि ले उड़ती है शबनम कोफिरा करते नहीं मजरूह-ए-उल्फ़त फ़िक्र-ए-दरमाँ मेंये ज़ख़्मी आप कर लेते हैं पैदा अपने मरहम कोमोहब्बत के शरर से दिल सरापा नूर होता हैज़रा से बीज से पैदा रियाज़-ए-तूर होता हैदवा हर दुख की है मजरूह-ए-तेग़-ए-आरज़ू रहनाइलाज-ए-ज़ख़्म है आज़ाद-ए-एहसान-ए-रफ़ू रहनाशराब-ए-बे-ख़ुदी से ता-फ़लक परवाज़ है मेरीशिकस्त-ए-रंग से सीखा है मैं ने बन के बू रहनाथमे क्या दीदा-ए-गिर्यां वतन की नौहा-ख़्वानी मेंइबादत चश्म-ए-शाइर की है हर दम बा-वज़ू रहनाबनाएँ क्या समझ कर शाख़-ए-गुल पर आशियाँ अपनाचमन में आह क्या रहना जो हो बे-आबरू रहनाजो तू समझे तो आज़ादी है पोशीदा मोहब्बत मेंग़ुलामी है असीर-ए-इम्तियाज़-ए-मा-ओ-तू रहनाये इस्तिग़्ना है पानी में निगूँ रखता है साग़र कोतुझे भी चाहिए मिस्ल-ए-हबाब-ए-आबजू रहनान रह अपनों से बे-परवा इसी में ख़ैर है तेरीअगर मंज़ूर है दुनिया में ओ बेगाना-ख़ू रहनाशराब-ए-रूह-परवर है मोहब्बत नौ-ए-इंसाँ कीसिखाया इस ने मुझ को मस्त बे-जाम-ओ-सुबू रहनामोहब्बत ही से पाई है शिफ़ा बीमार क़ौमों नेकिया है अपने बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता को बेदार क़ौमों नेबयाबान-ए-मोहब्बत दश्त-ए-ग़ुर्बत भी वतन भी हैये वीराना क़फ़स भी आशियाना भी चमन भी हैमोहब्बत ही वो मंज़िल है कि मंज़िल भी है सहरा भीजरस भी कारवाँ भी राहबर भी राहज़न भी हैमरज़ कहते हैं सब इस को ये है लेकिन मरज़ ऐसाछुपा जिस में इलाज-ए-गर्दिश-ए-चर्ख़-ए-कुहन भी हैजलाना दिल का है गोया सरापा नूर हो जानाये परवाना जो सोज़ाँ हो तो शम-ए-अंजुमन भी हैवही इक हुस्न है लेकिन नज़र आता है हर शय मेंये शीरीं भी है गोया बे-सुतूँ भी कोहकन भी हैउजाड़ा है तमीज़-ए-मिल्लत-ओ-आईं ने क़ौमों कोमिरे अहल-ए-वतन के दिल में कुछ फ़िक्र-ए-वतन भी हैसुकूत-आमोज़ तूल-ए-दास्तान-ए-दर्द है वर्नाज़बाँ भी है हमारे मुँह में और ताब-ए-सुख़न भी हैनमी-गर्दीद को तह रिश्ता-ए-मअ'नी रिहा कर्दमहिकायत बूद बे-पायाँ ब-ख़ामोशी अदा कर्दम
ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी-ए-तक़दीर हैपर्दा-ए-मजबूरी ओ बेचारगी तदबीर हैआसमाँ मजबूर है शम्स ओ क़मर मजबूर हैंअंजुम-ए-सीमाब-पा रफ़्तार पर मजबूर हैंहै शिकस्त अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार मेंसब्ज़ा ओ गुल भी हैं मजबूर-ए-नमू गुलज़ार मेंनग़्मा-ए-बुलबुल हो या आवाज़-ए-ख़ामोश-ए-ज़मीरहै इसी ज़ंजीर-ए-आलम-गीर में हर शय असीरआँख पर होता है जब ये सिर्र-ए-मजबूरी अयाँख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल-ए-रवाँक़ल्ब-ए-इंसानी में रक़्स-ए-ऐश-ओ-ग़म रहता नहींनग़्मा रह जाता है लुत्फ़-ए-ज़ेर-ओ-बम रहता नहींइल्म ओ हिकमत रहज़न-ए-सामान-ए-अश्क-ओ-आह हैया'नी इक अल्मास का टुकड़ा दिल-ए-आगाह हैगरचे मेरे बाग़ में शबनम की शादाबी नहींआँख मेरी माया-दार-ए-अश्क-ए-उननाबी नहींजानता हूँ आह में आलाम-ए-इंसानी का राज़है नवा-ए-शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़मेरे लब पर क़िस्सा-ए-नैरंगी-ए-दौराँ नहींदिल मिरा हैराँ नहीं ख़ंदा नहीं गिर्यां नहींपर तिरी तस्वीर क़ासिद गिर्या-ए-पैहम की हैआह ये तरदीद मेरी हिकमत-ए-मोहकम की हैगिर्या-ए-सरशार से बुनियाद-ए-जाँ पाइंदा हैदर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल-ए-संग-दिल शर्मिंदा हैमौज-ए-दूद-ए-आह से आईना है रौशन मिरागंज-ए-आब-आवर्द से मामूर है दामन मिराहैरती हूँ मैं तिरी तस्वीर के ए'जाज़ कारुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की परवाज़ कारफ़्ता ओ हाज़िर को गोया पा-ब-पा इस ने कियाअहद-ए-तिफ़्ली से मुझे फिर आश्ना इस ने कियाजब तिरे दामन में पलती थी वो जान-ए-ना-तवाँबात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँऔर अब चर्चे हैं जिस की शोख़ी-ए-गुफ़्तार केबे-बहा मोती हैं जिस की चश्म-ए-गौहर-बार केइल्म की संजीदा-गुफ़्तारी बुढ़ापे का शुऊ'रदुनयवी ए'ज़ाज़ की शौकत जवानी का ग़ुरूरज़िंदगी की ओज-गाहों से उतर आते हैं हमसोहबत-ए-मादर में तिफ़्ल-ए-सादा रह जाते हैं हमबे-तकल्लुफ़ ख़ंदा-ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैंफिर उसी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैंकिस को अब होगा वतन में आह मेरा इंतिज़ारकौन मेरा ख़त न आने से रहेगा बे-क़रारख़ाक-ए-मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगाअब दुआ-ए-नीम-शब में किस को मैं याद आऊँगातर्बियत से तेरी में अंजुम का हम-क़िस्मत हुआघर मिरे अज्दाद का सरमाया-ए-इज़्ज़त हुआदफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयातथी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयातउम्र भर तेरी मोहब्बत मेरी ख़िदमत-गर रहीमैं तिरी ख़िदमत के क़ाबिल जब हुआ तू चल बसीवो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंदतेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंदकारोबार-ए-ज़िंदगानी में वो हम-पहलू मिरावो मोहब्बत में तिरी तस्वीर वो बाज़ू मिरातुझ को मिस्ल-ए-तिफ़्लक-ए-बे-दस्त-ओ-पा रोता है वोसब्र से ना-आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वोतुख़्म जिस का तू हमारी किश्त-ए-जाँ में बो गईशिरकत-ए-ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गईआह ये दुनिया ये मातम-ख़ाना-ए-बरना-ओ-पीरआदमी है किस तिलिस्म-ए-दोश-ओ-फ़र्दा में असीरकितनी मुश्किल ज़िंदगी है किस क़दर आसाँ है मौतगुलशन-ए-हस्ती में मानिंद-ए-नसीम अर्ज़ां है मौतज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैंकैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैंकल्ब-ए-इफ़्लास में दौलत के काशाने में मौतदश्त ओ दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौतमौत है हंगामा-आरा क़ुलज़ुम-ए-ख़ामोश मेंडूब जाते हैं सफ़ीने मौज की आग़ोश मेंने मजाल-ए-शिकवा है ने ताक़त-ए-गुफ़्तार हैज़िंदगानी क्या है इक तोक़-ए-गुलू-अफ़्शार हैक़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद-ए-दिरा कुछ भी नहींइक मता-ए-दीदा-ए-तर के सिवा कुछ भी नहींख़त्म हो जाएगा लेकिन इम्तिहाँ का दौर भीहैं पस-ए-नौह पर्दा-ए-गर्दूं अभी दौर और भीसीना चाक इस गुल्सिताँ में लाला-ओ-गुल हैं तो क्यानाला ओ फ़रियाद पर मजबूर बुलबुल हैं तो क्याझाड़ियाँ जिन के क़फ़स में क़ैद है आह-ए-ख़िज़ाँसब्ज़ कर देगी उन्हें बाद-ए-बहार-ए-जावेदाँख़ुफ़्ता-ख़ाक-ए-पय सिपर में है शरार अपना तो क्याआरज़ी महमिल है ये मुश्त-ए-ग़ुबार अपना तो क्याज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकिस्तर नहींटूटना जिस का मुक़द्दर हो ये वो गौहर नहींज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा-ए-क़ुदरत में हैज़ौक़-ए-हिफ़्ज़-ए-ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में हैमौत के हाथों से मिट सकता अगर नक़्श-ए-हयातआम यूँ उस को न कर देता निज़ाम-ए-काएनातहै अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहींजिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहींआह ग़ाफ़िल मौत का राज़-ए-निहाँ कुछ और हैनक़्श की ना-पाएदारी से अयाँ कुछ और हैजन्नत-ए-नज़ारा है नक़्श-ए-हवा बाला-ए-आबमौज-ए-मुज़्तर तोड़ कर ता'मीर करती है हबाबमौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है येकितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है येफिर न कर सकती हबाब अपना अगर पैदा हवातोड़ने में उस के यूँ होती न बे-परवा हवाइस रविश का क्या असर है हैयत-ए-तामीर परये तो हुज्जत है हवा की क़ुव्वत-ए-तामीर परफ़ितरत-ए-हस्ती शहीद-ए-आरज़ू रहती न होख़ूब-तर पैकर की उस को जुस्तुजू रहती न होआह सीमाब-ए-परेशाँ अंजुम-ए-गर्दूं-फ़रोज़शोख़ ये चिंगारियाँ ममनून-ए-शब है जिन का सोज़अक़्ल जिस से सर-ब-ज़ानू है वो मुद्दत इन की हैसरगुज़िश्त-ए-नौ-ए-इंसाँ एक साअ'त उन की हैफिर ये इंसाँ आँ सू-ए-अफ़्लाक है जिस की नज़रक़ुदसियों से भी मक़ासिद में है जो पाकीज़ा-तरजो मिसाल-ए-शम्अ रौशन महफ़िल-ए-क़ुदरत में हैआसमाँ इक नुक़्ता जिस की वुसअत-ए-फ़ितरत में हैजिस की नादानी सदाक़त के लिए बेताब हैजिस का नाख़ुन साज़-ए-हस्ती के लिए मिज़राब हैशो'ला ये कम-तर है गर्दूं के शरारों से भी क्याकम-बहा है आफ़्ताब अपना सितारों से भी क्यातुख़्म-ए-गुल की आँख ज़ेर-ए-ख़ाक भी बे-ख़्वाब हैकिस क़दर नश्व-ओ-नुमा के वास्ते बेताब हैज़िंदगी का शो'ला इस दाने में जो मस्तूर हैख़ुद-नुमाई ख़ुद-फ़ज़ाई के लिए मजबूर हैसर्दी-ए-मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहींख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहींफूल बन कर अपनी तुर्बत से निकल आता है येमौत से गोया क़बा-ए-ज़िंदगी पाता है येहै लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंदडालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंदमौत तज्दीद-ए-मज़ाक़-ए-ज़िंदगी का नाम हैख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम हैख़ूगर-ए-परवाज़ को परवाज़ में डर कुछ नहींमौत इस गुलशन में जुज़ संजीदन-ए-पर कुछ नहींकहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-अजल है ला-दवाज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ादिल मगर ग़म मरने वालों का जहाँ आबाद हैहल्क़ा-ए-ज़ंजीर-ए-सुब्ह-ओ-शाम से आज़ाद हैवक़्त के अफ़्सूँ से थमता नाला-ए-मातम नहींवक़्त ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहींसर पे आ जाती है जब कोई मुसीबत ना-गहाँअश्क पैहम दीदा-ए-इंसाँ से होते हैं रवाँरब्त हो जाता है दिल को नाला ओ फ़रियाद सेख़ून-ए-दिल बहता है आँखों की सरिश्क-आबाद सेआदमी ताब-ए-शकेबाई से गो महरूम हैउस की फ़ितरत में ये इक एहसास-ए-ना-मालूम हैजौहर-ए-इंसाँ अदम से आश्ना होता नहींआँख से ग़ाएब तो होता है फ़ना होता नहींरख़्त-ए-हस्ती ख़ाक-ए-ग़म की शो'ला-अफ़्शानी से हैसर्द ये आग इस लतीफ़ एहसास के पानी से हैआह ये ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ ग़फ़्लत की ख़ामोशी नहींआगही है ये दिलासाई फ़रामोशी नहींपर्दा-ए-मशरिक़ से जिस दम जल्वा-गर होती है सुब्हदाग़ शब का दामन-ए-आफ़ाक़ से धोती है सुब्हलाला-ए-अफ़्सुर्दा को आतिश-क़बा करती है येबे-ज़बाँ ताइर को सरमस्त-ए-नवा करती है येसीना-ए-बुलबुल के ज़िंदाँ से सरोद आज़ाद हैसैकड़ों नग़्मों से बाद-ए-सुब्ह-दम-आबाद हैख़ुफ़्तगान-ए-लाला-ज़ार ओ कोहसार ओ रूद बारहोते हैं आख़िर उरूस-ए-ज़िंदगी से हम-कनारये अगर आईन-ए-हस्ती है कि हो हर शाम सुब्हमरक़द-ए-इंसाँ की शब का क्यूँ न हो अंजाम सुब्हदाम-ए-सिमीन-ए-तख़य्युल है मिरा आफ़ाक़-गीरकर लिया है जिस से तेरी याद को मैं ने असीरयाद से तेरी दिल-ए-दर्द आश्ना मामूर हैजैसे का'बे में दुआओं से फ़ज़ा मामूर हैवो फ़राएज़ का तसलसुल नाम है जिस का हयातजल्वा-गाहें उस की हैं लाखों जहान-ए-बे-सबातमुख़्तलिफ़ हर मंज़िल-ए-हस्ती को रस्म-ओ-राह हैआख़िरत भी ज़िंदगी की एक जौलाँ-गाह हैहै वहाँ बे-हासिली किश्त-ए-अजल के वास्तेसाज़गार आब-ओ-हवा तुख़्म-ए-अमल के वास्तेनूर-ए-फ़ितरत ज़ुल्मत-ए-पैकर का ज़िंदानी नहींतंग ऐसा हल्क़ा-ए-अफ़कार-ए-इंसानी नहींज़िंदगानी थी तिरी महताब से ताबिंदा-तरख़ूब-तर था सुब्ह के तारे से भी तेरा सफ़रमिस्ल-ए-ऐवान-ए-सहर मरक़द फ़रोज़ाँ हो तिरानूर से मामूर ये ख़ाकी शबिस्ताँ हो तिराआसमाँ तेरी लहद पर शबनम-अफ़्शानी करेसब्ज़ा-ए-नौ-रस्ता इस घर की निगहबानी करे
चलो छोड़ोमोहब्बत झूट हैअहद-ए-वफ़ा इक शग़्ल है बे-कार लोगों कातलब सूखे हुए पत्तों का बे-रौनक़ जज़ीरा हैख़लिश दीमक-ज़दा औराक़ पर बोसीदा सतरों का ज़ख़ीरा हैख़ुम्मार-ए-वस्ल तपती धूप के सीने पे उड़ते बादलों की राएगाँ बख़्शिश!ग़ुबार-ए-हिज्र-ए-सहरा में सराबों से अटे मौसम का ख़म्याज़ाचलो छोड़ोकि अब तक मैं अँधेरों की धमक में साँस की ज़र्बों पेचाहत की बिना रख कर सफ़र करता रहा हूँगामुझे एहसास ही कब थाकि तुम भी मौसमों के साथ अपने पैरहन के रंग बदलोगीचलो छोड़ोवो सारे ख़्वाब कच्ची भरभरी मिट्टी के बे-क़ीमत घरौंदे थेवो सारे ज़ाइक़े मेरी ज़बाँ पर ज़ख़्म बन कर जम गए होंगेतुम्हारी उँगलियों की नरम पोरें पत्थरों पर नाम लिखती थीं मिरा लेकिनतुम्हारी उँगलियाँ तो आदतन ये जुर्म करती थींचलो छोड़ोसफ़र में अजनबी लोगों से ऐसे हादसे सरज़द हुआ करते हैं सदियों सेचलो छोड़ोमिरा होना न होना इक बराबर हैतुम अपने ख़ाल-ओ-ख़द को आईने में फिर निखरने दोतुम अपनी आँख की बस्ती में फिर से इक नया मौसम उतरने दोमिरे ख़्वाबों को मरने दोनई तस्वीर देखोफिर नया मक्तूब लिखोफिर नए मौसम नए लफ़्ज़ों से अपना सिलसिला जोड़ोमिरे माज़ी की चाहत राएगाँ समझोमिरी यादों से कच्चे राब्ते तोड़ोचलो छोड़ोमोहब्बत झूट हैअहद-ए-वफ़ा इक शग़्ल है बे-कार लोगों का
ख़ुदा ने क़ुरआन में कहा हैकि लोगो मैं नेतुम्हारी ख़ातिरफ़लक बनायाफ़लक को तारों सेचाँद सूरज से जगमगायाकि लोगो मैं नेतुम्हारी ख़ातिरज़मीं बनाईज़मीं के सीने पेनदियों की लकीरें खींचींसमुंदरों कोज़मीं की आग़ोश में बिठायापहाड़ रक्खेदरख़्त उगाएदरख़्त पेफूल फल लगाएकि लोगो मैं नेतुम्हारी ख़ातिरये दिन बनायाकि दिन में कुछ काम कर सको तुमकि लोगो मैं नेतुम्हारी ख़ातिरये शब बनाईकि शब में आराम कर सको तुमकि लोगो मैं नेतुम्हारी ख़ातिरये सब बनायामगर न भूलोकि एक दिन मैंये सारी चीज़ें समेट लूँगा
ऐ देखने वालोइस हुस्न को देखोइस राज़ को समझोये नक़्श-ए-ख़यालीये फ़िक्रत-ए-आलीये पैकर-ए-तनवीरये कृष्ण की तस्वीरमअनी है कि सूरतसनअ'त है कि फ़ितरतज़ाहिर है कि मस्तूरनज़दीक है या दूरये नार है या नूरदुनिया से निरालाये बाँसुरी वालागोकुल का ग्वालाहै सेहर कि एजाज़खुलता ही नहीं राज़क्या शान है वल्लाहक्या आन है वल्लाहहैरान हूँ क्या हैइक शान-ए-ख़ुदा हैबुत-ख़ाने के अंदरख़ुद हुस्न का बुत-गरबुत बन गया आ करवो तुर्फ़ा नज़्ज़ारेयाद आ गए सारेजमुना के किनारेसब्ज़े का लहकनाफूलों का महकनाघनघोर घटाएँसरमस्त हवाएँमासूम उमंगेंउल्फ़त की तरंगेंवो गोपियों के साथहाथों में दिए हाथरक़्साँ हुआ ब्रिजनाथबंसी में जो लय हैनश्शा है न मय हैकुछ और ही शय हैइक रूह है रक़्साँइक कैफ़ है लर्ज़ांएक अक़्ल है मय-नोशइक होश है मदहोशइक ख़ंदा है सय्यालइक गिर्या है ख़ुश-हालइक इश्क़ है मग़रूरइक हुस्न है मजबूरइक सेहर है मसहूरदरबार में तन्हालाचार है कृष्णाआ श्याम इधर आसब अहल-ए-ख़ुसूमतहैं दर पए इज़्ज़तये राज दुलारेबुज़दिल हुए सारेपर्दा न हो ताराजबेकस की रहे लाजआ जा मेरे कालेभारत के उजालेदामन में छुपा लेवो हो गई अन-बनवो गर्म हुआ रनग़ालिब है दुर्योधनवो आ गए जगदीशवो मिट गई तशवीशअर्जुन को बुलायाउपदेश सुनायाग़म-ज़ाद का ग़म क्याउस्ताद का ग़म क्यालो हो गई तदबीरलो बन गई तक़दीरलो चल गई शमशीरसीरत है अदू-सोज़सूरत नज़र-अफ़रोज़दिल कैफ़ियत-अंदोज़ग़ुस्से में जो आ जाएबिजली ही गिरा जाएऔर लुत्फ़ पर आएतो घर भी लुटा जाएपरियों में है गुलफ़ामराधा के लिए श्यामबलराम का भय्यामथुरा का बसय्याबिंद्रा में कन्हैय्याबन हो गए वीराँबर्बाद गुलिस्ताँसखियाँ हैं परेशाँजमुना का किनारासुनसान है सारातूफ़ान हैं ख़ामोशमौजों में नहीं जोशलौ तुझ से लगी हैहसरत ही यही हैऐ हिन्द के राजाइक बार फिर आ जादुख दर्द मिटा जाअब्र और हवा सेबुलबुल की सदा सेफूलों की ज़िया सेजादू-असरी गुमशोरीदा-सरी गुमहाँ तेरी जुदाईमथुरा को न भाईतू आए तो शान आएतू आए तो जान आएआना न अकेलेहों साथ वो मेलेसखियों के झमेले
ख़बर सुनी है कभी जब तुम्हारे आने कीमैं आइने में दुल्हन बन के मुस्कुराई हूँगई हूँ दामन-ए-दिल को ख़ुशी से भरने मगरजहान भर की उदासी समेट लाई हूँ
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