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नज़्म
समझते हैं कहीं दीवानगान-ए-इश्क़ समझाए
तिरे होंटों पे मेरा नाम आ जाए तो आ जाना
राजेन्द्र नाथ रहबर
नज़्म
जो मौला-बख़्श से वो पीटते हैं मुझ को मकतब में
कोई समझाए उन को वक़्त भी बर्बाद होता है