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नज़्म
है अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहीं
जिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
इन का भोला-पन मिलता है सब को बाँह पसारे
इंसाँ जब तक बच्चा है तब तक समझो सच्चा है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
लुत्फ़ यकताई में जो है वो दुई में है कहाँ
बर-ख़िलाफ़ इस के जो हो समझो कि वो दीवाना है