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नज़्म
यही वो मंज़िल-ए-मक़्सूद है कि जिस के लिए
बड़े ही अज़्म से अपने सफ़र पे निकले थे
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
फिर आहिस्ता आहिस्ता तारीक होने लगी थी कि अंधा मुसाफ़िर
उछल कर किसी सम्त-ए-बे-नाम को चल दया था
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
नज़्म
लम्हा लम्हा मुसलसल लहू के तसलसुल में जलता रहूँ
उस के रौशन चराग़ों में जश्न-ए-जमाल-ए-तुलू’-ए-सहर तक