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नज़्म
इक रोज़ मगर बरखा-रुत में वो भादों थी या सावन था
दीवार पे बीच समुंदर के ये देखने वालों ने देखा
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
उस की ज़मीं बे-हुदूद उस का उफ़ुक़ बे-सग़ूर
उस के समुंदर की मौज दजला ओ दनयूब ओ नील
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अपनी ख़ाकिस्तर समुंदर को है सामान-ए-वजूद
मर के फिर होता है पैदा ये जहान-ए-पीर देख