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नज़्म
ख़ाक-ओ-ख़ूँ में मिल रहा है तुर्कमान-ए-सख़्त-कोश
आग है औलाद-ए-इब्राहीम है नमरूद है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
एक ये चाँद-नगर का बासी जिस से दूर रहा संजोग
वर्ना इस दुनिया में सब ने चाहा चाँद और पाया चाँद
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
तारीख़ है इस की एक अमल तहलीलों का तरकीबों का
सम्बंध वो दो आदर्शों का संजोग वो दो तहज़ीबों का
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
मेरा वतन हिन्दोस्ताँ हर राह जिस की कहकशाँ
कोह-ए-गिराँ से कम नहीं जिस के जियाले नौजवाँ
रिफ़अत सरोश
नज़्म
आ कि ज़हर अब बादा-ए-सर-जोश है तेरे बग़ैर
है ख़िज़ाँ-आलूदा सुब्ह-ए-गुलसिताँ तेरे बग़ैर
जौहर निज़ामी
नज़्म
वक़्त-ए-सहर, ख़ामोश धुँदलका नाच रहा है सेहन-ए-जहाँ में
ताबिंदा, पुर-नूर सितारे, जगमग जगमग करते करते