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नज़्म
कजरी के बोल फूट रहे थे
सरकंडा हाथ में लिए हुए नंग-धड़ंग चरवाहा बिर्हा की तान लगा रहा था
अम्बर बहराईची
नज़्म
ये इक शाम-ए-अज़ाब-ए-बे-सरोकाराना हालत है
हुए जाने की हालत में हूँ बस फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत है
जौन एलिया
नज़्म
नान-बाई का काम ख़त्म कर लो तो मेरे पास आना
यहाँ किनारे पर सरकंडों का जंगल आप ही आप उग आया है
सरवत हुसैन
नज़्म
पर्दा सरका तो मअन फ़न के पुजारी गरजे
''रक़्स क्यूँ ख़त्म हुआ? वक़्त अभी बाक़ी था''