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नज़्म
नसरीन अंजुम सेठी
नज़्म
है दुनिया जिस का नाँव मियाँ ये और तरह की बस्ती है
जो मंहगों को ये महँगी है और सस्तों को ये सस्ती है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
सोने की चटाई तक भी नहीं, हम ज़ात के इतने हेटे हैं
ये सेजों पर सोने वाले शायद भगवान के बेटे हैं
जमील मज़हरी
नज़्म
कहीं है इज्तिमा तब्लीग़ियों का एक कोठी में
तो है शीओं की मज्लिस और रक़ाइम दूसरे घर में
सय्यदा फ़रहत
नज़्म
परों को ज़ोरों से फड़फड़ाते थे और सेहनों में दौड़ते थे
यहीं था सब कुछ सफ़ीर-ए-लैला
अली अकबर नातिक़
नज़्म
हाथों में दिलबरों के साग़र किसी के शीशा
कमरों में झोलियों में सेरों गुलाल बाँधा
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मजीद अमजद
नज़्म
घरों के सेहनों में किलकारियाँ हैं बच्चों की
मोहब्बतों के दिए हैं हर इक शबिस्ताँ में
रहमान फ़ारिस
नज़्म
काल और क़हत की सेजों को सजाती नहीं मैं
ख़ून मज़दूर का गलियों में बहाती नहीं मैं