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नज़्म
तलाश-ए-हुस्न में शेर-ओ-अदब में दोस्ती में
रुँधी सदा से मोहब्बत की भीक माँगी है
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
मैं शायर हूँ मुझे फ़ितरत के नज़्ज़ारों से उल्फ़त है
मिरा दिल दुश्मन-ए-नग़्मा-सराई हो नहीं सकता
साहिर लुधियानवी
नज़्म
तुझ को मालूम नहीं तुझ को भला क्या मालूम
तेरे चेहरे के ये सादा से अछूते से नुक़ूश
हिमायत अली शाएर
नज़्म
शायर की नवा हो कि मुग़न्नी का नफ़स हो
जिस से चमन अफ़्सुर्दा हो वो बाद-ए-सहर क्या!