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नज़्म
अपने गुलशन की तबाही का गिला किस से करूँ
शाम-ए-ग़ुर्बत की सियाही का गिला किस से करूँ
इफ़्फ़त ज़ेबा काकोरवी
नज़्म
जब मेरे कपड़ों के गहरे ज़ख़्म बे-आवाज़ जेबें
भर नहीं सकते तमन्नाएँ सर-ए-मिज़्गान-ए-ग़ुर्बत
बिमल कृष्ण अश्क
नज़्म
सवाद-ए-ग़ुर्बत में ख़ेमा-गाहों की जैसे गाड़ी हों ख़ुश्क चोबें
कभी न शाने झुका के चलना
अली अकबर नातिक़
नज़्म
लेकिन ऐ जान-ए-सुख़न तुझ को ख़बर है कि नहीं
मेरे काशाना-ए-ग़ुर्बत पे नज़र है कि नहीं
मुस्लिम शमीम
नज़्म
लेकिन ऐ जान-ए-सुख़न तुझ को ख़बर है कि नहीं
मेरे काशाना-ए-ग़ुर्बत पे नज़र है कि नहीं
मुस्लिम शमीम
नज़्म
किसे ख़बर है कि अर्ज़-ए-वतन पे क्या गुज़री
कि तुझ को गोशा-ए-ग़ुर्बत में मौत आई है
रविश सिद्दीक़ी
नज़्म
रक़्स करता रहा हर ज़र्रा रह-ए-ग़ुर्बत में
क्या बगूले थे मिरे गिर्द जो मंडलाते रहे