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नज़्म
टुकड़े होता है जिगर देहली के सदमे सुन के 'ऐश'
और दिल फटता है सुन कर हाल-ए-ज़ार-ए-लखनऊ
हकीम आग़ा जान ऐश
नज़्म
फ़ितरतन दिल में न था मेरे कभी अरमान-ए-ऐश
बंद कर लेता था आँखें देख कर सामान-ए-ऐश