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नज़्म
'दौराँ' मैं बज़्म-ए-दोस्त में छेड़ूँ न क्यूँ ग़ज़ल
ये ज़मज़मे के दिन हैं लहकने की उम्र है
ओवेस अहमद दौराँ
नज़्म
ख़ून-ए-दिल की कोई क़ीमत जो नहीं है तो न हो
ख़ून-ए-दिल नज़्र-ए-चमन-बनदी-ए-दौरां कर दे
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
हाँ कज करो कुलाह कि सब कुछ लुटा के हम
अब बे-नियाज़-ए-गर्दिश-ए-दौराँ हुए तो हैं