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नज़्म
ख़िज़्र की बेजा ख़ुशामद ही मुक़द्दम है यहाँ
वस्ल-ए-मंज़िल के लिए पा-ए-जुनूँ शर्त नहीं
ज़हीर सिद्दीक़ी
नज़्म
वो गुलशन जो कभी आज़ाद था गुज़रे ज़माने में
मैं हूँ शाख़-ए-शिकस्ता याँ उसी उजड़े गुलिस्ताँ की