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नज़्म
क्या कहूँ 'शाहिद' किसी से थी ये ऐसी ग़म की शाम
दिल में सोज़-ए-ना-मुकम्मल लब पे आह-ए-ना-तमाम
शाहिद सागरी
नज़्म
इक़बाल सुहैल
नज़्म
शहीद-ए-जौर-ए-गुलचीं हैं असीर-ए-ख़स्ता-तन हम हैं
हमारा जुर्म इतना है हवा-ख़्वाह-ए-चमन हम हैं
आनंद नारायण मुल्ला
नज़्म
शाहिद-ए-बज़्म-ए-सुख़न नाज़ूरा-ए-मअ'नी-तराज़
ऐ ख़ुदा-ए-रेख़्ता पैग़मबर-ए-सोज़-अो-गुदाज़
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
अक़ल्लीयत जहाँ भी है यही उस का मुक़द्दर है
ये ज़ख़्मी बे-अमाँ मख़्लूक़ हर सू ज़ेर-ए-ख़ंजर है
ओवेस अहमद दौराँ
नज़्म
फिर इत्तिसाल-ए-गर्दन-ओ-ख़ंजर है क्या कहूँ
फिर इख़्तिलात-ए-ज़ख़्म-ओ-नमक-दाँ है क्या करूँ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
हिलाल-ए-'ईद को क्यों ख़ंजर-ए-नाज़-ओ-अदा कहिए
बुरा क्या है जो मेहराब-ए-जबीन-ए-दिल-रुबा कहिए
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
न सुर्ख़ी-ए-लब-ए-खंजर न रंग-ए-नोक-ए-सिनाँ
न ख़ाक पर कोई धब्बा न बाम पर कोई दाग़