aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "shakebaa"
कील सी दहलीज़ में पैवस्त ये कैसी चमक हैधूल अज्राम-ए-फ़लक कीगुत्थियाँ मौहूम सी रिश्तों की ये कैसी हैंसुलझाना नहीं ज़िन्हार वर्नाहू का आलम है नमूदान कीसुलझ जाने के बादसब्ज़ा-ए-नौरस्ता के पर्दे में सारे ऊँच नीचपाटते रहने के ऐ आनंदबहते पानियों की आत्माकिस के हैं ये उस्तुख़्वाँमलबे में ढलते उस्तुख़्वाँख़ाक-ए-उफ़्तादा की अगली और पिछलीहर परत केबे-ज़बाँ ता'मीर-ए-कारमेहरबाँ सा इक तबस्सुमऔर शाइस्ता इशारा घर की जानिबजैसे घर के बाम-ओ-दर पर हो नविश्ताहर सवाल-ए-ना-शकेबा का जवाबफिर उधर देखा तो सब कुछदश्त-ए-इख़्फ़ा मैं था अदीमग़ार कुटियाएँ मचानेंघर घरौंदेसारे आसार-ओ-मज़ाहिरगूँज में अपनी समो करले उड़ी बाँग चील
चमक हीरे से बढ़ कर ऐ तबस्सुम तुझ में पिन्हाँ हैउन्हीं होंटों पे ज़ौ बिखरा तू जिन होंटों को शायाँ हैमिसाल-ए-बर्क़ तू गिरता है जान-ए-ना-शकेबा परगिरी थी जिस तरह बिजली कलीम-ए-तूर-ए-सीना परन होगा ला'ल कोई तेरी क़ीमत का बदख़्शाँ मेंतू ही इक मिस्रा-ए-बरजस्ता है क़ुदरत के दीवाँ मेंजहाँ की दौलतों में कोई भी दौलत नहीं ऐसीफ़लक पर कब चमकती है सितारों की जबीं ऐसीग़म-ए-दुनिया का शाकी जब हुआ हक़ से दिल-ए-आदमतुझे दे कर अता फ़रमा दिया हर ज़ख़्म का मरहमहुआ जाता है पज़मुर्दा दिल-ए-आवारा सीने मेंतो टपका क़तरा-ए-आब-ए-बक़ा इस आबगीने मेंझलक पल-भर की है लेकिन असर है दाइमी तेरासर-ए-गुलज़ार दम भरती है गोया हर कली तेरालब-ए-जाँ-बख़्श पर कुछ कुछ नुमायाँ हो के रह जा फिरअधूरी रह गई है दास्तान-ए-इश्क़ कह जा फिर
जवानी ना-शकेबा नर्दबान-ए-'अर्श-ए-आ'ज़म हैजवानी राहत-अफ़ज़ा बा'इस-ए-हुस्न-ए-दो-'आलम हैजवानी इम्तिहाँ है ज़िंदगी के दर्स-ए-'इबरत काजवानी एक तोहफ़ा है रज़ा-ए-रब्बुल-'इज़्ज़त काजवानी ज़िंदगी के साज़ का दिल-कश तराना हैजवानी एक मुहमल एक बा-मा'ना फ़साना हैजवानी राज़-दार-ए-कुन-फ़काँ है सिर्र-ए-आदम हैजवानी इंक़लाब-अंगेज़ है पहना-ए-‘आलम हैजवानी दुश्मन-ए-इंसाँ है ग़म्माज़-ए-हक़ीक़त हैजवानी मस्लक-ए-दुश्वार सर-ता-पा मुसीबत हैजवानी अश्क की सूरत बरस जाती है आँखों सेजवानी लाख लाती है बलाएँ सर पे इंसाँ केजवानी इक गुल-ए-मख़्सूस है बुस्तान-ए-'आलम काइसी गुलशन में आ कर इम्तिहाँ होता है आदम काजवानी चुपके चुपके रूह पर क़ब्ज़ा जमाती हैसुहाने गीत गाती है रग-ओ-पय में समाती हैजवानी एक आईना है 'अक्स-ए-ज़िंदगानी काये पहलू दूसरा पहलू है बज़्म-ए-आसमानी काजवानी की किरन हर आँख को ख़ीरा बनाती हैये ताज़ा गुल खिलाती है ग़लत राहें दिखाती हैजवानी एक टेढ़ा रास्ता है राह-ए-हस्ती काजहाँ एहसास होता ही नहीं कुछ औज-ओ-पस्ती काजवानी एक पर्दा है जो मुस्तक़बिल छुपाता हैबहुत से बे-ख़बर लोगों को दीवाने बनाता हैजवानी एक दरिया है जो चढ़ते ही उतरता हैजो इस में डूबता है जा के पस्ती में उभरता हैजवानी एक टेढ़ा रास्ता है बज़्म-ए-फ़ानी काजहाँ मिलता है परवाना हयात-ए-जावेदानी काजवानी मुज़्दा-ए-पीरी मुरक़्क़ा' है 'इबादत काइसी के बा'द कुछ एहसास होता है रियाज़त काजवानी ख़ून अपने दौर में अक्सर रुलाती हैब-आसानी ये फ़र्ज़ानों को दीवाना बनाती हैजवानी ऐसी मंज़िल है जहाँ अंदेशा-ए-ग़म हैकरे इंसान जितना ग़ौर इस पर वो 'रज़ी' कम है
ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी-ए-तक़दीर हैपर्दा-ए-मजबूरी ओ बेचारगी तदबीर हैआसमाँ मजबूर है शम्स ओ क़मर मजबूर हैंअंजुम-ए-सीमाब-पा रफ़्तार पर मजबूर हैंहै शिकस्त अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार मेंसब्ज़ा ओ गुल भी हैं मजबूर-ए-नमू गुलज़ार मेंनग़्मा-ए-बुलबुल हो या आवाज़-ए-ख़ामोश-ए-ज़मीरहै इसी ज़ंजीर-ए-आलम-गीर में हर शय असीरआँख पर होता है जब ये सिर्र-ए-मजबूरी अयाँख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल-ए-रवाँक़ल्ब-ए-इंसानी में रक़्स-ए-ऐश-ओ-ग़म रहता नहींनग़्मा रह जाता है लुत्फ़-ए-ज़ेर-ओ-बम रहता नहींइल्म ओ हिकमत रहज़न-ए-सामान-ए-अश्क-ओ-आह हैया'नी इक अल्मास का टुकड़ा दिल-ए-आगाह हैगरचे मेरे बाग़ में शबनम की शादाबी नहींआँख मेरी माया-दार-ए-अश्क-ए-उननाबी नहींजानता हूँ आह में आलाम-ए-इंसानी का राज़है नवा-ए-शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़मेरे लब पर क़िस्सा-ए-नैरंगी-ए-दौराँ नहींदिल मिरा हैराँ नहीं ख़ंदा नहीं गिर्यां नहींपर तिरी तस्वीर क़ासिद गिर्या-ए-पैहम की हैआह ये तरदीद मेरी हिकमत-ए-मोहकम की हैगिर्या-ए-सरशार से बुनियाद-ए-जाँ पाइंदा हैदर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल-ए-संग-दिल शर्मिंदा हैमौज-ए-दूद-ए-आह से आईना है रौशन मिरागंज-ए-आब-आवर्द से मामूर है दामन मिराहैरती हूँ मैं तिरी तस्वीर के ए'जाज़ कारुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की परवाज़ कारफ़्ता ओ हाज़िर को गोया पा-ब-पा इस ने कियाअहद-ए-तिफ़्ली से मुझे फिर आश्ना इस ने कियाजब तिरे दामन में पलती थी वो जान-ए-ना-तवाँबात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँऔर अब चर्चे हैं जिस की शोख़ी-ए-गुफ़्तार केबे-बहा मोती हैं जिस की चश्म-ए-गौहर-बार केइल्म की संजीदा-गुफ़्तारी बुढ़ापे का शुऊ'रदुनयवी ए'ज़ाज़ की शौकत जवानी का ग़ुरूरज़िंदगी की ओज-गाहों से उतर आते हैं हमसोहबत-ए-मादर में तिफ़्ल-ए-सादा रह जाते हैं हमबे-तकल्लुफ़ ख़ंदा-ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैंफिर उसी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैंकिस को अब होगा वतन में आह मेरा इंतिज़ारकौन मेरा ख़त न आने से रहेगा बे-क़रारख़ाक-ए-मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगाअब दुआ-ए-नीम-शब में किस को मैं याद आऊँगातर्बियत से तेरी में अंजुम का हम-क़िस्मत हुआघर मिरे अज्दाद का सरमाया-ए-इज़्ज़त हुआदफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयातथी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयातउम्र भर तेरी मोहब्बत मेरी ख़िदमत-गर रहीमैं तिरी ख़िदमत के क़ाबिल जब हुआ तू चल बसीवो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंदतेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंदकारोबार-ए-ज़िंदगानी में वो हम-पहलू मिरावो मोहब्बत में तिरी तस्वीर वो बाज़ू मिरातुझ को मिस्ल-ए-तिफ़्लक-ए-बे-दस्त-ओ-पा रोता है वोसब्र से ना-आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वोतुख़्म जिस का तू हमारी किश्त-ए-जाँ में बो गईशिरकत-ए-ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गईआह ये दुनिया ये मातम-ख़ाना-ए-बरना-ओ-पीरआदमी है किस तिलिस्म-ए-दोश-ओ-फ़र्दा में असीरकितनी मुश्किल ज़िंदगी है किस क़दर आसाँ है मौतगुलशन-ए-हस्ती में मानिंद-ए-नसीम अर्ज़ां है मौतज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैंकैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैंकल्ब-ए-इफ़्लास में दौलत के काशाने में मौतदश्त ओ दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौतमौत है हंगामा-आरा क़ुलज़ुम-ए-ख़ामोश मेंडूब जाते हैं सफ़ीने मौज की आग़ोश मेंने मजाल-ए-शिकवा है ने ताक़त-ए-गुफ़्तार हैज़िंदगानी क्या है इक तोक़-ए-गुलू-अफ़्शार हैक़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद-ए-दिरा कुछ भी नहींइक मता-ए-दीदा-ए-तर के सिवा कुछ भी नहींख़त्म हो जाएगा लेकिन इम्तिहाँ का दौर भीहैं पस-ए-नौह पर्दा-ए-गर्दूं अभी दौर और भीसीना चाक इस गुल्सिताँ में लाला-ओ-गुल हैं तो क्यानाला ओ फ़रियाद पर मजबूर बुलबुल हैं तो क्याझाड़ियाँ जिन के क़फ़स में क़ैद है आह-ए-ख़िज़ाँसब्ज़ कर देगी उन्हें बाद-ए-बहार-ए-जावेदाँख़ुफ़्ता-ख़ाक-ए-पय सिपर में है शरार अपना तो क्याआरज़ी महमिल है ये मुश्त-ए-ग़ुबार अपना तो क्याज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकिस्तर नहींटूटना जिस का मुक़द्दर हो ये वो गौहर नहींज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा-ए-क़ुदरत में हैज़ौक़-ए-हिफ़्ज़-ए-ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में हैमौत के हाथों से मिट सकता अगर नक़्श-ए-हयातआम यूँ उस को न कर देता निज़ाम-ए-काएनातहै अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहींजिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहींआह ग़ाफ़िल मौत का राज़-ए-निहाँ कुछ और हैनक़्श की ना-पाएदारी से अयाँ कुछ और हैजन्नत-ए-नज़ारा है नक़्श-ए-हवा बाला-ए-आबमौज-ए-मुज़्तर तोड़ कर ता'मीर करती है हबाबमौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है येकितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है येफिर न कर सकती हबाब अपना अगर पैदा हवातोड़ने में उस के यूँ होती न बे-परवा हवाइस रविश का क्या असर है हैयत-ए-तामीर परये तो हुज्जत है हवा की क़ुव्वत-ए-तामीर परफ़ितरत-ए-हस्ती शहीद-ए-आरज़ू रहती न होख़ूब-तर पैकर की उस को जुस्तुजू रहती न होआह सीमाब-ए-परेशाँ अंजुम-ए-गर्दूं-फ़रोज़शोख़ ये चिंगारियाँ ममनून-ए-शब है जिन का सोज़अक़्ल जिस से सर-ब-ज़ानू है वो मुद्दत इन की हैसरगुज़िश्त-ए-नौ-ए-इंसाँ एक साअ'त उन की हैफिर ये इंसाँ आँ सू-ए-अफ़्लाक है जिस की नज़रक़ुदसियों से भी मक़ासिद में है जो पाकीज़ा-तरजो मिसाल-ए-शम्अ रौशन महफ़िल-ए-क़ुदरत में हैआसमाँ इक नुक़्ता जिस की वुसअत-ए-फ़ितरत में हैजिस की नादानी सदाक़त के लिए बेताब हैजिस का नाख़ुन साज़-ए-हस्ती के लिए मिज़राब हैशो'ला ये कम-तर है गर्दूं के शरारों से भी क्याकम-बहा है आफ़्ताब अपना सितारों से भी क्यातुख़्म-ए-गुल की आँख ज़ेर-ए-ख़ाक भी बे-ख़्वाब हैकिस क़दर नश्व-ओ-नुमा के वास्ते बेताब हैज़िंदगी का शो'ला इस दाने में जो मस्तूर हैख़ुद-नुमाई ख़ुद-फ़ज़ाई के लिए मजबूर हैसर्दी-ए-मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहींख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहींफूल बन कर अपनी तुर्बत से निकल आता है येमौत से गोया क़बा-ए-ज़िंदगी पाता है येहै लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंदडालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंदमौत तज्दीद-ए-मज़ाक़-ए-ज़िंदगी का नाम हैख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम हैख़ूगर-ए-परवाज़ को परवाज़ में डर कुछ नहींमौत इस गुलशन में जुज़ संजीदन-ए-पर कुछ नहींकहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-अजल है ला-दवाज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ादिल मगर ग़म मरने वालों का जहाँ आबाद हैहल्क़ा-ए-ज़ंजीर-ए-सुब्ह-ओ-शाम से आज़ाद हैवक़्त के अफ़्सूँ से थमता नाला-ए-मातम नहींवक़्त ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहींसर पे आ जाती है जब कोई मुसीबत ना-गहाँअश्क पैहम दीदा-ए-इंसाँ से होते हैं रवाँरब्त हो जाता है दिल को नाला ओ फ़रियाद सेख़ून-ए-दिल बहता है आँखों की सरिश्क-आबाद सेआदमी ताब-ए-शकेबाई से गो महरूम हैउस की फ़ितरत में ये इक एहसास-ए-ना-मालूम हैजौहर-ए-इंसाँ अदम से आश्ना होता नहींआँख से ग़ाएब तो होता है फ़ना होता नहींरख़्त-ए-हस्ती ख़ाक-ए-ग़म की शो'ला-अफ़्शानी से हैसर्द ये आग इस लतीफ़ एहसास के पानी से हैआह ये ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ ग़फ़्लत की ख़ामोशी नहींआगही है ये दिलासाई फ़रामोशी नहींपर्दा-ए-मशरिक़ से जिस दम जल्वा-गर होती है सुब्हदाग़ शब का दामन-ए-आफ़ाक़ से धोती है सुब्हलाला-ए-अफ़्सुर्दा को आतिश-क़बा करती है येबे-ज़बाँ ताइर को सरमस्त-ए-नवा करती है येसीना-ए-बुलबुल के ज़िंदाँ से सरोद आज़ाद हैसैकड़ों नग़्मों से बाद-ए-सुब्ह-दम-आबाद हैख़ुफ़्तगान-ए-लाला-ज़ार ओ कोहसार ओ रूद बारहोते हैं आख़िर उरूस-ए-ज़िंदगी से हम-कनारये अगर आईन-ए-हस्ती है कि हो हर शाम सुब्हमरक़द-ए-इंसाँ की शब का क्यूँ न हो अंजाम सुब्हदाम-ए-सिमीन-ए-तख़य्युल है मिरा आफ़ाक़-गीरकर लिया है जिस से तेरी याद को मैं ने असीरयाद से तेरी दिल-ए-दर्द आश्ना मामूर हैजैसे का'बे में दुआओं से फ़ज़ा मामूर हैवो फ़राएज़ का तसलसुल नाम है जिस का हयातजल्वा-गाहें उस की हैं लाखों जहान-ए-बे-सबातमुख़्तलिफ़ हर मंज़िल-ए-हस्ती को रस्म-ओ-राह हैआख़िरत भी ज़िंदगी की एक जौलाँ-गाह हैहै वहाँ बे-हासिली किश्त-ए-अजल के वास्तेसाज़गार आब-ओ-हवा तुख़्म-ए-अमल के वास्तेनूर-ए-फ़ितरत ज़ुल्मत-ए-पैकर का ज़िंदानी नहींतंग ऐसा हल्क़ा-ए-अफ़कार-ए-इंसानी नहींज़िंदगानी थी तिरी महताब से ताबिंदा-तरख़ूब-तर था सुब्ह के तारे से भी तेरा सफ़रमिस्ल-ए-ऐवान-ए-सहर मरक़द फ़रोज़ाँ हो तिरानूर से मामूर ये ख़ाकी शबिस्ताँ हो तिराआसमाँ तेरी लहद पर शबनम-अफ़्शानी करेसब्ज़ा-ए-नौ-रस्ता इस घर की निगहबानी करे
रात भर दीदा-ए-नमनाक में लहराते रहेसाँस की तरह से आप आते रहे जाते रहेख़ुश थे हम अपनी तमन्नाओं का ख़्वाब आएगाअपना अरमान बर-अफ़गन्दा-नक़ाब आएगानज़रें नीची किए शरमाए हुए आएगाकाकुलें चेहरे पे बिखराए हुए आएगाआ गई थी दिल-ए-मुज़्तर में शकेबाई सीबज रही थी मिरे ग़म-ख़ाने में शहनाई सीपतियाँ खड़कीं तो समझा कि लो आप आ ही गएसज्दे मसरूर कि मा'बूद को हम पा ही गएशब के जागे हुए तारों को भी नींद आने लगीआप के आने की इक आस थी अब जाने लगीसुब्ह ने सेज से उठते हुए ली अंगड़ाईओ सबा! तू भी जो आई तो अकेली आईमेरे महबूब मिरी नींद उड़ाने वालेमेरे मस्जूद मिरी रूह पे छाने वालेआ भी जा, ताकि मिरे सज्दों का अरमाँ निकलेआ भी जा, कि तिरे क़दमों पे मिरी जाँ निकले
गुज़र रहे हैं शब ओ रोज़ तुम नहीं आतींरियाज़-ए-ज़ीस्त है आज़ुरदा-ए-बहार अभीमिरे ख़याल की दुनिया है सोगवार अभीजो हसरतें तिरे ग़म की कफ़ील हैं प्यारीअभी तलक मिरी तन्हाइयों में बस्ती हैंतवील रातें अभी तक तवील हैं प्यारीउदास आँखें तिरी दीद को तरसती हैंबहार-ए-हुस्न पे पाबंदी-ए-जफ़ा कब तकये आज़माइश-ए-सब्र-ए-गुरेज़-पा कब तकक़सम तुम्हारी बहुत ग़म उठा चुका हूँ मैंग़लत था दावा-ए-सब्र-ओ-शकेब आ जाओक़रार-ए-ख़ातिर-ए-बेताब थक गया हूँ मैं
ऐ जहाँ-ज़ाद,नशात उस शब-ए-बे-राह-रवी कीमैं कहाँ तक भूलूँ?ज़ोर-ए-मय था कि मेरे हाथ की लर्ज़िश थीकि उस रात कोई जाम गिरा टूट गयातुझे हैरत न हुई!कि तिरे घर के दरीचों के कई शीशों परउस से पहले की भी दुर्ज़ें थीं बहुततुझे हैरत न हुई!ऐ जहाँ-ज़ाद,मैं कूज़ों की तरफ़ अपने तग़ारों की तरफ़अब जो बग़दाद से लौटा हूँतो मैं सोचता हूँसोचता हूँ तू मेरे सामने आईना रहीसर-ए-बाज़ार दरीचे में सर-ए-बिस्तर-ए-संजाब कभीतू मेरे सामने आईना रहीजिस में कुछ भी नज़र आया न मुझेअपनी ही सूरत के सिवाअपनी तन्हाई-ए-जाँ-काह की दहशत के सिवा!लिख रहा हूँ तुझे ख़तऔर वो आईना मेरे हाथ में हैइस में कुछ भी नज़र आता नहींअब एक ही सूरत के सिवा!लिख रहा हूँ तुझे ख़तऔर मुझे लिखना भी कहाँ आता है?लौह-ए-आईना पे अश्कों की फव्वारों ही सेख़त क्यूँ न लिखूँ?ऐ जहाँ-ज़ाद,नशात उस शब-ए-बे-राह-रवी कीमुझे फिर लाएगी?वक़्त क्या चीज़ है तू जानती है?वक़्त इक ऐसा पतिंगा हैजो दीवारों पे आईनों पेपैमानों पे शीशों पेमिरे जाम ओ सुबू मेरे तग़ारों पेसदा रेंगता है
उरूस-ए-शब की ज़ुल्फ़ें थीं अभी ना-आश्ना ख़म सेसितारे आसमाँ के बे-ख़बर थे लज़्ज़त-ए-रम सेक़मर अपने लिबास-ए-नौ में बेगाना सा लगता थान था वाक़िफ़ अभी गर्दिश के आईन-ए-मुसल्लम सेअभी इम्काँ के ज़ुल्मत-ख़ाने से उभरी ही थी दुनियामज़ाक़-ए-ज़िंदगी पोशीदा था पहना-ए-आलम सेकमाल-ए-नज़्म-ए-हस्ती की अभी थी इब्तिदा गोयाहुवैदा थी नगीने की तमन्ना चश्म-ए-ख़ातम सेसुना है आलम-ए-बाला में कोई कीमिया-गर थासफ़ा थी जिस की ख़ाक-ए-पा में बढ़ कर साग़र-ए-जम सेलिखा था अर्श के पाए पे इक इक्सीर का नुस्ख़ाछुपाते थे फ़रिश्ते जिस को चश्म-ए-रूह-ए-आदम सेनिगाहें ताक में रहती थीं लेकिन कीमिया-गर कीवो इस नुस्ख़े को बढ़ कर जानता था इस्म-ए-आज़म सेबढ़ा तस्बीह-ख़्वानी के बहाने अर्श की जानिबतमन्ना-ए-दिली आख़िर बर आई सई-ए-पैहम सेफिराया फ़िक्र-ए-अज्ज़ा ने उसे मैदान-ए-इम्काँ मेंछुपेगी क्या कोई शय बारगाह-ए-हक़ के महरम सेचमक तारे से माँगी चाँद से दाग़-ए-जिगर माँगाउड़ाई तीरगी थोड़ी सी शब की ज़ुल्फ़-ए-बरहम सेतड़प बिजली से पाई हूर से पाकीज़गी पाईहरारत ली नफ़स-हा-ए-मसीह-ए-इब्न-ए-मरयम सेज़रा सी फिर रुबूबियत से शान-ए-बे-नियाज़ी लीमलक से आजिज़ी उफ़्तादगी तक़दीर शबनम सेफिर इन अज्ज़ा को घोला चश्मा-ए-हैवाँ के पानी मेंमुरक्कब ने मोहब्बत नाम पाया अर्श-ए-आज़म सेमुहव्विस ने ये पानी हस्ती-ए-नौ-ख़ेज़ पर छिड़कागिरह खोली हुनर ने उस के गोया कार-ए-आलम सेहुई जुम्बिश अयाँ ज़र्रों ने लुत्फ़-ए-ख़्वाब को छोड़ागले मिलने लगे उठ उठ के अपने अपने हमदम सेख़िराम-ए-नाज़ पाया आफ़्ताबों ने सितारों नेचटक ग़ुंचों ने पाई दाग़ पाए लाला-ज़ारों ने
ऐ सिपहर-ए-बरीं के सय्यारोऐ फ़ज़ा-ए-ज़मीं के गुल-ज़ारोऐ पहाड़ों की दिल-फ़रेब फ़ज़ाऐ लब-ए-जू की ठंडी ठंडी हवाऐ अनादिल के नग़मा-ए-सहरीऐ शब-ए-माहताब तारों भरीऐ नसीम-ए-बहार के झोंकोदहर-ए-ना-पाएदार के धोकोतुम हर इक हाल में हो यूँ तो अज़ीज़थे वतन में मगर कुछ और ही चीज़जब वतन में हमारा था रमनातुम से दिल बाग़ बाग़ था अपनातुम मिरी दिल-लगी के सामाँ थेतुम मिरे दर्द-ए-दिल के दरमाँ थेतुम से कटता था रंज-ए-तन्हाईतुम से पाता था दिल शकेबाईआन इक इक तुम्हारी भाती थीजो अदा थी वो जी लुभाती थीकरते थे जब तुम अपनी ग़म-ख़्वारीधोई जाती थीं कुलफ़तें सारीजब हवा खाने बाग़ जाते थेहो के ख़ुश-हाल घर में आते थेबैठ जाते थे जब कभी लब-ए-आबधो के उठते थे दिल के दाग़ शिताबकोह ओ सहरा ओ आसमान ओ ज़मींसब मिरी दिल-लगी की शक्लें थींपर छुटा जिस से अपना मुल्क ओ दयारजी हुआ तुम से ख़ुद-ब-ख़ुद बेज़ारन गुलों की अदा ख़ुश आती हैन सदा बुलबुलों की भाती हैसैर-ए-गुलशन है जी का इक जंजालशब-ए-महताब जान को है वबालकोह ओ सहरा से ता लब-ए-दरियाजिस तरफ़ जाएँ जी नहीं लगताक्या हुए वो दिन और वो रातेंतुम में अगली सी अब नहीं बातेंहम ही ग़ुर्बत में हो गए कुछ औरया तुम्हारे बदल गए कुछ तौरगो वही हम हैं और वही दुनियापर नहीं हम को लुत्फ़ दुनिया काऐ वतन ऐ मिरे बहिश्त-ए-बरीँक्या हुए तेरे आसमान ओ ज़मींरात और दिन का वो समाँ न रहावो ज़मीं और वो आसमाँ न रहातेरी दूरी है मोरिद-ए-आलामतेरे छुटने से छुट गया आरामकाटे खाता है बाग़ बिन तेरेगुल हैं नज़रों में दाग़ बिन तेरेमिट गया नक़्श कामरानी कातुझ से था लुत्फ़ ज़िंदगानी काजो कि रहते हैं तुझ से दूर सदाइन को क्या होगा ज़िंदगी का मज़ाहो गया याँ तो दो ही दिन में ये हालतुझ बिन एक एक पल है इक इक सालसच बता तो सभी को भाता हैया कि मुझ से ही तेरा नाता हैमैं ही करता हूँ तुझ पे जान निसारया कि दुनिया है तेरी आशिक़-ए-ज़ारक्या ज़माने को तू अज़ीज़ नहींऐ वतन तू तो ऐसी चीज़ नहींजिन ओ इंसान की हयात है तूमुर्ग़ ओ माही की काएनात है तूहै नबातात का नुमू तुझ सेरूख तुझ बिन हरे नहीं होतेसब को होता है तुझ से नश्व-ओ-नुमासब को भाती है तेरी आब-ओ-हवातेरी इक मुश्त-ए-ख़ाक के बदलेलूँ न हरगिज़ अगर बहिश्त मिलेजान जब तक न हो बदन से जुदाकोई दुश्मन न हो वतन से हवा
सद हज़ार बातें थींहीला-ए-शकेबाईसूरतों की ज़ेबाईकामतों की रानाईइन सियाह रातों मेंएक भी न याद आईजा-ब-जा भटकते हैंकिस की राह तकते हैंचाँद के तमन्नाईये नगर कभी पहलेइस क़दर न वीराँ थाकहने वाले कहते हैंक़र्या-ए-निगाराँ थाख़ैर अपने जीने काये भी एक सामाँ था
शहर-ए-दिल की गलियों मेंशाम से भटकते हैंचाँद के तमन्नाईबे-क़रार सौदाईदिल-गुदाज़ तारीकीजाँ-गुदाज़ तन्हाईरूह-ओ-जाँ को डसती हैरूह-ओ-जाँ में बस्ती हैशहर-ए-दिल की गलियों मेंताक शब की बेलों परशबनमीं सरिश्कों कीबे-क़रार लोगों नेबे-शुमार लोगों नेयादगार छोड़ी हैइतनी बात थोड़ी हैसद-हज़ार बातें थींहीला-ए-शकेबाईसूरतों की ज़ेबाईकामतों की रा'नाईउन सियाह रातों मेंएक भी न याद आईजा-ब-जा भटकते हैंकिस की राह तकते हैंचाँद के तमन्नाईये नगर कभी पहलेइस क़दर न वीराँ थाकहने वाले कहते हैंक़र्या-ए-निगाराँ थाख़ैर अपने जीने काये भी एक सामाँ थाआज दिल में वीरानीअब्र बन के घिर आईआज दिल को क्या कहिएबा-वफ़ा न हरजाईफिर भी लोग दीवानेआ गए हैं समझानेअपनी वहशत-ए-दिल केबुन लिए हैं अफ़्सानेख़ुश-ख़याल दुनिया नेगर्मियाँ तो जाती हैंवो रुतें भी आती हैंजब मलूल रातों मेंदोस्तों की बातों मेंजी न चैन पाएगाऔर ऊब जाएगाआहटों से गूँजेगीशहर-ए-दिल की पिन्हाईऔर चाँद-रातों मेंचाँदनी के शैदाईहर बहाने निकलेंगेआरज़ू की गीराईढूँडने को रुस्वाईसर्द सर्द रातों कोज़र्द चाँद बख़्शेगाबे-हिसाब तन्हाईबे-हिजाब तन्हाईशहर-ए-दिल की गलियों में
मैं चलूँ शाना-ब-शाना तो बुरा मत मानेंमेरी हुरमत मेरी 'अज़्मत को ज़रा पहचानें
ज़ुल्म की रात बहुत जल्द टलेगी अब तोआग चूल्हों में हर इक रोज़ जलेगी अब तोभूक के मारे कोई बच्चा नहीं रोएगाचैन की नींद हर एक शख़्स यहाँ सोएगाआँधी नफ़रत की चलेगी न कहीं अब के बरसप्यार की फ़स्ल उगाएगी ज़मीं अब के बरसहै यक़ीं अब न कोई शोर-शराबा होगाज़ुल्म होगा न कहीं ख़ून-ख़राबा होगाओस और धूप के सदमे न सहेगा कोईअब मिरे देश में बेघर न रहेगा कोईनए वादों का जो डाला है वो जाल अच्छा हैरहनुमाओं ने कहा है कि ये साल अच्छा हैदिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है
यही रस्ता मिरी मंज़िल की तरफ़ जाता हैजिस के फ़ुट-पाथ फ़क़ीरों से अटे रहते हैंख़स्ता कपड़ों में ये लिपटे हुए मरियल ढाँचेये भिकारी कि जिन्हें देख के घिन आती है
चलो सुल्ह कर लेंचलो अपने बच्चों की आइंदा नस्लों की ख़ातिरमोहब्बत की आइंदा फ़स्लों की ख़ातिरझगड़ना करें ख़त्म और सुल्ह करेंचलें आज शाना-ब-शाना नई ज़िंदगी के नए मार्च में हमकि जिस में चलेगी बराबर बराबरतुम्हारी भी मर्ज़ीहमारी भी मर्ज़ी
ऐ मिरी उम्मीद मेरी जाँ-नवाज़ऐ मिरी दिल-सोज़ मेरी कारसाज़मेरी सिपर और मिरे दिल की पनाहदर्द-ओ-मुसीबत में मिरी तकिया-गाहऐश में और रंज मैं मेरी शफ़ीक़कोह में और दश्त में मेरी रफ़ीक़काटने वाली ग़म-ए-अय्याम कीथामने वाली दिल-ए-नाकाम कीदिल प पड़ा आन के जब कोई दुखतेरे दिलासे से मिला हम को सुखतू ने न छोड़ा कभी ग़ुर्बत में साथतू ने उठाया न कभी सर से हाथजी को हो कभी अगर उसरत का रंजखोल दिए तू नय क़नाअ'त के गंजतुझ से है मोहताज का दिल बे-हिरासतुझ से है बीमार को जीने की आसख़ातिर-ए-रंजूर का दरमाँ है तूआशिक़-ए-महजूर का ईमाँ है तूनूह की कश्ती का सहारा थी तूचाह में यूसुफ़ की दिल-आरा थी तूराम के हम-राह चढ़ी रन में तूपांडव के भी साथ फिरी बन में तूतू ने सदा क़ैस का बहलाया दिलथाम लिया जब कभी घबराया दिलहो गया फ़रहाद का क़िस्सा तमामपर तिरे फ़िक़्रों पे रहा ख़ुश मुदामतू ने ही राँझे की ये बंधवाई आसहीर थी फ़ुर्क़त में भी गोया कि पासहोती है तू पुश्त पे हिम्मत की जबमुश्किलें आसाँ नज़र आती हैं सबहाथ में जब आ के लिया तू ने हातसात समुंदर से गुज़रना है बातसाथ मिला जिस को तिरा दो क़दमकहता है वो ये है अरब और अजमघोड़े की ली अपने जहाँ तू ने बागसामने है तेरे गया और परागअज़्म को जब देती है तू मेल जस्तगुम्बद-ए-गर्दूं नज़र आता है पस्ततू ने दिया आ के उभारा जहाँसमझे कि मुट्ठी में है सारा जहाँज़र्रे को ख़ुर्शीद में दे खपाबंदे को अल्लाह से दे तू मिलादोनों जहाँ की है बंधी तुझ से लड़दीन की तू अस्ल है दुनिया की जड़नेकियों की तुझ से है क़ाएम असासतू न हो तो जाएँ न नेकी के पासदीन की तुझ बिन कहीं पुर्सिश न होतू न हो तो हक़ की परस्तिश न होख़ुश्क था बिन तेरे दरख़्त-ए-अमलतू ने लगाए हैं ये सब फूल फलदिल को लुभाती है कभी बन के हूरगाह दिखाती है शराब-ए-तहूरनाम है सिदरा कभी तूबा तिरारोज़ निराला है तमाशा तिराकौसर ओ तसनीम है या सलसबीलजल्वे हैं सब तेरे ये बे-क़ाल-ओ-क़ीलरूप हैं हर पंथ में तेरे अलगहै कहीं फ़िरदौस कहीं है स्वर्गछूट गए सारे क़रीब और बईदएक न छूटी तो न छूटी उमीदतेरे ही दम से कटे जो दिन थे सख़्ततेरे ही सदक़े से मिला ताज-ओ-तख़्तख़ाकियों की तुझ से है हिम्मत बुलंदतू न हो तो काम हों दुनिया के बंदतुझ से ही आबाद है कौन-ओ-मकाँतू न हो तो है भी बरहम जहाँकोई पड़ता फिरता है बहर-ए-मआशहै कोई इक्सीर को करता तलाशइक तमन्ना में है औलाद कीएक को दिल-दार की है लौ लगीएक को है धन जो कुछ हाथ आएधूम से औलाद की शादी रचाएएक को कुछ आज अगर मिल गयाकल की है ये फ़िक्र कि खाएँगे क्याक़ौम की बहबूद का भूका है एकजिन में हो उन के लिए अंजाम-ए-नेकएक को है तिशनगी-ए-क़ुर्ब-ए-हक़जिस ने किया दिल से जिगर तक है शक़जो है ग़रज़ उस की नई जुस्तुजूलाख अगर दिल हैं तो लाख आरज़ूतुझ से हैं दिल सब के मगर बाग़ बाग़गुल कोई होने नहीं पाता चराग़सब ये समझते हैं कि पाई मुरादकहती है जब तू कि अब आई मुरादवा'दा तिरा रास्त हो या हो दरोग़तू ने दिए हैं उसे क्या क्या फ़रोग़वा'दे वफ़ा करती है गो चंद तूरखती है हर एक को ख़ुरसंद तूभाती है सब को तिरी लैत-ओ-लअ'लतू ने कहाँ सीखी है ये आज कलतल्ख़ को तू चाहे तो शीरीं करेबज़्म-ए-अज़ा को तरब-आगीं करेआने न दे रंज को मुफ़्लिस के पासरखे ग़नी उस को रहे जिस के पासयास का पाती है जो तू कुछ लगावसैकड़ों करती है उतार और चढ़ाओआने नहीं देती दिलों पर हिरासटूटने देती नहीं तालिब की आसजिन को मयस्सर न हो कमली फटीख़ुश हैं तवक़्क़ो पे वो ज़र-बफ़्त कीचटनी से रोटी का है जिन की बनावबैठे पकाते हैं ख़याली पोलावपाँव में जूती नहीं पर है ये ज़ौक़घोड़ा जो सब्ज़ा हो तो नीला हो तौक़फ़ैज़ के खोले हैं जहाँ तू ने बाबदेखते हैं झोंपड़े महलों के ख़्वाबतेरे करिश्मे हैं ग़ज़ब दिल-फ़रेबदिल में नहीं छोड़ते सब्र-ओ-शकेबतुझ से मुहव्विस ने जो शूरा लियाफूँक दिया कान में क्या जाने क्यादिल से भुलाया ज़न ओ फ़रज़ंद कोलग गया घुन नख़्ल-ए-बरोमँद कोखाने से पीने से हुआ सर्द जीऐसी कुछ इक्सीर की है लौ लगीदीन की है फ़िक्र न दुनिया से कामधुन है यही रात दिन और सुब्ह शामधोंकनी है बैठ के जब धोंकनाशह को समझता है इक अदना गदापैसे को जब ताव पे देता है तावपूछता यारों से है सोने का भावकहता है जब हँसते हैं सब देख कररह गई इक आँच की बाक़ी कसरहै इसी धुँद में वो आसूदा-हालतू ने दिया अक़्ल पे पर्दा सा डालतोल कर गर देखिए उस की ख़ुशीकोई ख़ुशी इस को न पहुँचे कभीफिरते हैं मोहताज कई तीरा-बख़्तजन के पैरों में था कभी ताज-ओ-तख़्तआज जो बर्तन हैं तो कल घर करोमलती है मुश्किल से इन्हें नान-ए-जौतैरे सिवा ख़ाक नहीं इन के पाससारी ख़ुदाई में है ले दे के आसफूले समाते नहीं इस आस परसाहिब-ए-आलम उन्हें कहिए अगरखाते हैं इस आस प क़स्में अजीबझूटे को हो तख़्त न या-रब नसीबहोता है नाैमीदियों का जब हुजूमआती है हसरत की घटा झूम झूमलगती है हिम्मत की कमर टूटनेहौसला का लगता है जी छूटनेहोती है बे-सब्री ओ ताक़त में जंगअर्सा-ए-आलम नज़र आता है तंगजी में ये आता है कि सम खाइएफाड़ के या कपड़े निकल जाइएबैठने लगता है दिल आवे की तरहयास डराती है छलावे की तरहहोता है शिकवा कभी तक़दीर काउड़ता है ख़ाका कभी तदबीर काठनती है गर्दूं से लड़ाई कभीहोती है क़िस्मत की हँसाई कभीजाता है क़ाबू से आख़िर दिल निकलकरती है इन मुश्किलों को तू ही हलकान में पहुँची तिरी आहट जो हैंरख़्त-ए-सफ़र यास नय बाँधा वहींसाथ गई यास के पज़मुर्दगीहो गई काफ़ूर सब अफ़्सुर्दगीतुझ में छुपा राहत-ए-जाँ का है भेदछोड़ियो 'हाली' का न साथ ऐ उमीद
सभी ने 'ईद मनाई मिरे गुलिस्ताँ मेंकिसी ने फूल पिरोए किसी ने ख़ार चुने
''पत्थर की ज़बाँ'' की शाएरा नेइक महफ़िल-ए-शेर-ओ-शायरी मेंजब नज़्म सुनाते मुझ को देखाकुछ सोच के दिल में मुस्कुराई
मिरा जुनून-ए-वफ़ा है ज़वाल-आमादाशिकस्त हो गया तेरा फ़ुसून-ए-ज़ेबाईउन आरज़ूओं पे छाई है गर्द-ए-मायूसीजिन्हों ने तेरे तबस्सुम में परवरिश पाईफ़रेब-ए-शौक़ के रंगीं तिलिस्म टूट गएहक़ीक़तों ने हवादिस से फिर जिला पाईसुकून-ओ-ख़्वाब के पर्दे सरकते जाते हैंदिमाग़-ओ-दिल में हैं वहशत की कार-फ़रमाईवो तारे जिनमें मोहब्बत का नूर ताबाँ थावो तारे डूब गए ले के रंग-ओ-रानाईसुला गई थीं जिन्हें तेरी मुल्तफ़ित नज़रेंवो दर्द जाग उठे फिर से ले के अंगड़ाईअजीब आलम-ए-अफ़्सुर्दगी है रू-बा-फ़रोग़न जब नज़र को तक़ाज़ा न दिल तमन्नाईतिरी नज़र तिरे गेसू तिरी जबीं तिरे लबमिरी उदास-तबीअत है सब से उकताईमैं ज़िंदगी के हक़ाएक़ से भाग आया थाकि मुझ को ख़ुद में छुपाए तिरी फ़ुसूँ-ज़ाईमगर यहाँ भी तआ'क़ुब किया हक़ाएक़ नेयहाँ भी मिल न सकी जन्नत-ए-शकेबाईहर एक हाथ में ले कर हज़ार आईनेहयात बंद दरीचों से भी गुज़र आईमिरे हर एक तरफ़ एक शोर गूँज उठाऔर उस में डूब गई इशरतों की शहनाईकहाँ तलक करे छुप-छुप के नग़्मा-पैराईवो देख सामने के पुर-शिकोह ऐवाँ सेकिसी किराए की लड़की की चीख़ टकराईवो फिर समाज ने दो प्यार करने वालों कोसज़ा के तौर पर बख़्शी तवील तन्हाईफिर एक तीरा-ओ-तारीक झोंपड़ी के तलेसिसकते बच्चे पे बेवा की आँख भर आईवो फिर बिकी किसी मजबूर की जवाँ बेटीवो फिर झुका किसी दर पर ग़ुरूर-ए-बरनाईवो फिर किसानों के मजमे' पे गन-मशीनों सेहुक़ूक़-याफ़ता तबक़े ने आग बरसाईसुकूत-ए-हल्क़ा-ए-ज़िंदाँ से एक गूँज उठीऔर इस के साथ मिरे साथियों की याद आईनहीं नहीं मुझे यूँ मुल्तफ़ित नज़र से न देखनहीं नहीं मुझे अब ताब-ए-नग़्मा-पैराईमिरा जुनून-ए-वफ़ा है ज़वाल-आमादाशिकस्त हो गया तेरा फुसून-ए-ज़ेबाई
हसन में तिरे सामने आईना थीतिरे हिज्र और वस्ल का आईनाइंहिमाक ओ तअ'ल्लुक़ की मिट्टी से गूँधे हुए जिस्म कोतेरी आँखों की हिद्दत ने चमकाया थातेरी ख़ल्वत की हैरत ने वो रंग ओ रोग़न किए थेकि आईने शश्दर खड़े रह गए थेमगर तेरी ख़ल्वत की हैरत में वहशत का जो शाइबा थानिगाहों से मेरी कहाँ छुप सका था
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