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नज़्म
आँख हैराँ रूह-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा बेताब है
ये हमारे ख़्वाब की ता'बीर है ये ख़्वाब है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूटी हों अफ़्साने हों
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
आज तो हम बिकने को आए, आज हमारे दाम लगा
यूसुफ़ तो बाज़ार-ए-वफ़ा में, एक टिके को बिकता है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ला, तबर ख़ून के दरिया में नहाने दे मुझे
सर-ए-पुर-नख़वत-ए-अर्बाब-ए-ज़माँ तोडूँगा
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
आदमी मिन्नत-कश-ए-अरबाब-ए-इरफ़ाँ ही रहा
दर्द-ए-इंसानी मगर महरूम-ए-दरमाँ ही रहा
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
वो जिन की फ़िक्र में रहती थी मैं 'वफ़ा' बेचैन
ग़म-ओ-ख़ुशी के मिरे तर्जुमान हो गए हैं
अमतुल हई वफ़ा
नज़्म
हो कुछ इस तरह गुल-अफ़्शानी-ए-अर्बाब-ए-सुख़न
जिस से पामाली-ए-गुलबाँग-ए-अनादिल हो जाए