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नज़्म
ज़फ़र सय्यद
नज़्म
मैं जो चाहूँ ग़म-ए-हस्ती का इज़ाला कर दूँ
ज़ुल्मत-ए-बख़्त को इक पल में उजाला कर दूँ
ख्वाजा मंज़र हसन मंज़र
नज़्म
और इस मंज़र के पीछे रैली-बाज़ों का हुजूम
तुझ को ले आया कहाँ ऐ शहर तेरा बख़्त-ए-शूम
रज़ा नक़वी वाही
नज़्म
इक क़बीला जो मुख़ालिफ़ था शुऊ'री फ़िक्र का
था तरक़्क़ी-वादियों से जिस को बुग़्ज़-ए-लिल्लाही
रज़ा नक़वी वाही
नज़्म
अर्श से फ़र्श पे करता है नुज़ूल
और उसी लम्हा वो बद-बख़्त वो मर्ताज़ी-ए-तस्बीह-ओ-रुकु-ओ-सज्दा
वहीद अख़्तर
नज़्म
छप रही है मसनवी-ए-'मीर' भी बा-ख़त्त-ए-'मीर'
अब जदीद उर्दू अदब का हो रहा है इंतिज़ाम