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नज़्म
ख़्वाह क़ातिल की तरह आए कि महबूब-सिफ़त
दिल से बस होगी यही हर्फ़-ए-विदाअ की सूरत
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तुझ को वो रुख़ अपनी सीरत का दिए देते हैं हम
जिस में यज़्दानी निसाइयत की ज़ुल्फ़ों के हैं ख़म
जोश मलीहाबादी
नज़्म
चौक चौक पर गली गली में सुर्ख़ फरेरे लहराते हैं
मज़लूमों के बाग़ी लश्कर सैल-सिफ़त उमडे आते हैं