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नज़्म
तो सिटे चमक कर सोना हो गए
फिर वही फ़स्ल काटने का वक़्त आया तो मेरे ख़ुलूस की दरांती कुंद हो गई
तबस्सुम ज़िया
नज़्म
ओढ़नी सीते सीते उस की पोरें भी पक जाती थीं
मगर कपास की फ़स्ल से उस ने हिस्सा कभी नहीं पाया
इशरत आफ़रीं
नज़्म
मेरे सीने पर मगर रखी हुई शमशीर सी
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ