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नज़्म
सर्द रातों का हसीं इक ख़्वाब है चेहरा तिरा
क्या कहूँ बस मंज़र-ए-नायाब है चेहरा तिरा
जय राज सिंह झाला
नज़्म
ये तुम्हारा देस राजा द्रुप्द का पंचाल देस
हाँ वही रणजीत-सिंह के दौर का ख़ुश-हाल देस