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नज़्म
सोचता हूँ कि तुझे मिल के मैं जिस सोच में हूँ
पहले उस सोच का मक़्सूम समझ लूँ तो कहूँ
साहिर लुधियानवी
नज़्म
सब जिसे इंतिहा कहें तू उसे इब्तिदा समझ
हो न इसी समझ पे ख़ुश यूँही बढ़ाए जा समझ
अली मंज़ूर हैदराबादी
नज़्म
रंजिश जो हमारे बीच रही तो आग फ़लक ने बरसाई
अब सोच न कुछ मौसम को समझ ऐ यार ये पहली बारिश है
सुहैल काकोरवी
नज़्म
तुम्हारी अम्मी ने अपनी इज़्ज़त को मर्तबानों में बंद कर के
मकाँ की छत से लटकते छींके में रख दिया था