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नज़्म
जो सोज़-ए-इश्क़ रखते हैं लगी रहती है लौ उन को
तजल्ली ढूँडने वाले ही परवानों में रहते हैं
तकमील रिज़वी लखनवी
नज़्म
अगर सोज़-ए-यक़ीं दिल में है आँखें देख ही लेंगी
छुपा रक्खेगा मंज़िल को ग़ुबार-ए-कारवाँ कब तक
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
मगर क्या कीजिए जब फ़ैसला ये है मशिय्यत का
कि मैं फ़ितरत की आँखों से गिरूँ अश्क-ए-रवाँ हो कर
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
मर्हबा ऐ आतिश-ए-दिल आफ़रीं ऐ सोज़-ए-इश्क़
हर-नफ़स में इक हयात-ए-जाविदाँ पाता हूँ मैं
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
क़ुमरियाँ मीठे सुरों के साज़ ले कर आ गईं
बुलबुलें मिल-जुल के आज़ादी के गुन गाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
क़ैस आख़िर मर गया सोज़-ए-दरून-ए-इश्क़ से
खा गई अफ़्सोस उस पौदे को गर्मी खाद की
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
अफ़सोस मुल्क-भर में हो इक चराग़ वो भी
बुझ जाए जलते जलते सोज़-ए-ग़म-ए-निहाँ से
ज़ाहिदा ख़ातून शरवानिया
नज़्म
मता-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी पैमाना ओ बरबत
मैं ख़ुद को इन खिलौनों से भी अब बहला नहीं सकता
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
ख़ुदी में डूब के हंगामा आज़मा हो जा
ख़ुदी न हो तो न सोज़-ए-यक़ीं न सोज़-ए-हयात