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नज़्म
अगर मैं जिस्म हूँ तो सर से पाँव तक मैं जिस्म हूँ
अगर मैं रूह हूँ तो फिर तमाम-तर मैं रूह हूँ
बलराज कोमल
नज़्म
मिरी दुनिया में कुछ वक़अत नहीं है रक़्स ओ नग़्मा की
मिरा महबूब नग़्मा शोर-ए-आहंग-ए-बग़ावत है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
ख़ुद-ब-ख़ुद रूठी हुई बिफरी हुई बिखरी हुई
शोर-ए-पैहम से दिल-ए-गीती को धड़काती हुई