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नज़्म
दिल की न पूछो क्या कुछ चाहे दिल का तो फैला है दामन
गीत से गाल ग़ज़ल सी आँखें साअद-ए-सीमीं बर्ग-ए-दहन
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ये शोर-ए-हश्र ये पैकार-ए-सुब्हा-ओ-ज़ुन्नार
ये जाँ-गुदाज़ फ़ज़ाएँ ये रूह-सोज़ बहार
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
दिल-ए-बरगश्ता को लेकिन ये मैं ने बात समझाई
''नहीं कुछ सुब्हा-ओ-ज़ुन्नार के फंदे मैं गीराई''
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
ऐ कि ख़्वाबीदा तिरी ख़ाक में शाहाना वक़ार
ऐ कि हर ख़ार तिरा रू-कश-ए-सद-रू-ए-निगार
जोश मलीहाबादी
नज़्म
वर्ना 'ग़ालिब' की ज़बाँ में मिरे हमदम मिरे दोस्त
दाम हर मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ख़ून-ए-दिल में है निहाँ शोला-ए-सद-रंग-ए-बहार
इस गुलिस्ताँ में हैं इस राज़ के महरम कितने
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
मगर इन में मिरे उस्ताद-ए-देरीना बहुत कम थे
जो दो इक थे भी वो मसरूफ़-ए-सद-अफ़्कार-ए-पैहम थे