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नज़्म
दिल की न पूछो क्या कुछ चाहे दिल का तो फैला है दामन
गीत से गाल ग़ज़ल सी आँखें साअद-ए-सीमीं बर्ग-ए-दहन
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ये शोर-ए-हश्र ये पैकार-ए-सुब्हा-ओ-ज़ुन्नार
ये जाँ-गुदाज़ फ़ज़ाएँ ये रूह-सोज़ बहार
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
दिल-ए-बरगश्ता को लेकिन ये मैं ने बात समझाई
''नहीं कुछ सुब्हा-ओ-ज़ुन्नार के फंदे मैं गीराई''
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
ख़ून-ए-दिल में है निहाँ शोला-ए-सद-रंग-ए-बहार
इस गुलिस्ताँ में हैं इस राज़ के महरम कितने
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
जिस पे बिखरे हैं मह-ओ-साल के सदियों के ग़ुबार
जैसे तारीख़ के औराक़ ये महफ़ूज़ सुतूर
दुर अंजुम सिद्दीक़ी
नज़्म
था ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-देहली ग़ैरत-ए-सद-लाला-ज़ार
रश्क-ए-सद-गुलज़ार था एक एक ख़ार-ए-लखनऊ
हकीम आग़ा जान ऐश
नज़्म
ऐ कि ख़्वाबीदा तिरी ख़ाक में शाहाना वक़ार
ऐ कि हर ख़ार तिरा रू-कश-ए-सद-रू-ए-निगार