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नज़्म
सुब्ह सुब्ह इक ख़्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला' देखा
सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैं
गुलज़ार
नज़्म
और तू कहती है इस सुबह का सौदा कर लूँ
दिल में इन शो'लों के बदले तिरे जल्वे भर लूँ
नरेश कुमार शाद
नज़्म
राह-ए-हक़ में न थे पाबंद किसी मज़हब के
तारिक़-ए-सुबहा-ओ-ज़ुन्नार गुरु-नानक थे