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नज़्म
सफ़ीर-ए-लैला यही खंडर हैं जहाँ से आग़ाज़-ए-दास्ताँ है
ज़रा सा बैठो तो मैं सुनाऊँ
अली अकबर नातिक़
नज़्म
शाम को फिर से चराग़ाँ करूँ हिम्मत ही नहीं
क़िस्से वो फिर से सुनाऊँ तुझे क़ुव्वत ही नहीं