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नज़्म
नज़र आए रज़ा-कारान-ए-नीली-पोश सफ़-दर-सफ़
मिरे दिल में सुरूर उतरा मिरी आँखों में नूर आया
ज़फ़र अली ख़ाँ
नज़्म
ज़माने ने सुपुर्द-ए-ख़ाक तेरे कर दिए साथी
न उन की पत्तियाँ बाक़ी न उन में रंग-ओ-बू बाक़ी
नारायण दास पूरी
नज़्म
चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम