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नज़्म
ज़माने ने सुपुर्द-ए-ख़ाक तेरे कर दिए साथी
न उन की पत्तियाँ बाक़ी न उन में रंग-ओ-बू बाक़ी
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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ज़माने ने सुपुर्द-ए-ख़ाक तेरे कर दिए साथी
न उन की पत्तियाँ बाक़ी न उन में रंग-ओ-बू बाक़ी