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नज़्म
क़य्यूम नज़र
नज़्म
निगाह को थी मगर मीर-ए-कारवाँ की तलाश
नज़र जो उट्ठी तो देखा कि एक मर्द-ए-फ़क़ीर
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
समुंदरों की सत्ह भी नज़र न आई दूर-दूर
वसीअ' आसमान में उड़ान भर के थक गया था फिर ज़मीन पर रुका
बदनाम नज़र
नज़्म
ख़ाक के ज़र्रों को तनवीर-ए-नज़र देता है वो
फूल की पत्ती को लोहे का जिगर देता है वो
हबीब जौनपुरी
नज़्म
ता-हद्द-ए-नज़र जब नज़रों में जन्नत के नज़ारे होते थे
बातों में किनाए होते थे नज़रों में इशारे होते थे
नज़ीर बनारसी
नज़्म
ऐ मिरे नूर-ए-नज़र लख़्त-ए-जिगर जान-ए-सुकूँ
नींद आना तुझे दुश्वार नहीं है सो जा
कफ़ील आज़र अमरोहवी
नज़्म
क़ल्ब ओ नज़र की ज़िंदगी दश्त में सुब्ह का समाँ
चश्मा-ए-आफ़्ताब से नूर की नद्दियाँ रवाँ!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
चश्म-ब-राह नज़र आते हैं वो नक़्द-ए-निगार
जिन की फ़ितरत को उपज से नहीं बिल्कुल सरोकार