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नज़्म
कभी सिकंदर कभी क़लंदर कभी बगूला कभी ख़याल
स्वाँग रचाए और गुज़र की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
बाज़ार गली और कूचों में ग़ुल-शोर मचाया होली ने
या स्वाँग कहूँ या रंग कहूँ या हुस्न बताऊँ होली का
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मैं भी दिल के बहलाने को क्या क्या स्वाँग रचाता हूँ
सायों के झुरमुट में बैठा सुख की सेज सजाता हूँ
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
बकरे के पीछे पीछे हैं मजनूँ का भर के स्वाँग
गर हो सके ख़रीदिए बकरे की एक टाँग
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
ताज चाहो ताज दे दूँ या अजंता माँग देखो
जिस तरह भी दिल कहे, मेरी कला का स्वाँग देखो
सलाम मछली शहरी
नज़्म
गरचे पहले सूफ़ियाना स्वाँग ने धोका दिया
लेकिन आँखों की चमक ने तुझ को पहचनवा दिया