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नज़्म
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
ख़्वाहिश-ए-साया-ए-गेसू-ए-परेशाँ ही नहीं
जन्नत-ए-आरिज़-ओ-लब की भी तमन्ना न करूँ
इम्तियाज़ अहमद क़मर
नज़्म
ज़िया-ए-ख़ामोश के सुकूत-आश्ना तरन्नुम में घुल रहा है
कि उक़्दा-ए-गेसू-ए-शब-ए-तार खुल रहा है
कृष्ण मोहन
नज़्म
जब रखते हो तुम अबरू-ए-ख़मदार वग़ैरा
क्यों बाँधे पड़े फिरते हो तलवार वग़ैरा
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
गुल-ए-सहर की न गेसू-ए-शाम की ख़ुशबू
फ़ज़ा फ़ज़ा में है तेरे कलाम की ख़ुशबू