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नज़्म
तभी तो हम ने तोड़ दिया था रिश्ता-ए-शोहरत-ए-आम
तभी तो हम ने छोड़ दिया था शहर-ए-नुमूद-ओ-नाम
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
न माली हो कभी ग़ाफ़िल न अन-बन अहल-ए-गुलशन में
तभी समझेंगे हम यारों हक़ीक़त में बहार आई
जयकृष्ण चौधरी हबीब
नज़्म
हाँ मगर ख़ास क़दम उठते हैं राहों में तभी
ये ज़मीं चाँद सितारों से उधर डोलती है
अम्बरीन सलाहुद्दीन
नज़्म
मगर अल्लाह ने हर चीज़ को क़ाबू में रक्खा है
निज़ाम-ए-ज़िंदगी 'सफ़दर' तभी तो इतना अच्छा है