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नज़्म
ब-ज़ाहिर ख़ुश खड़ा हूँ मैं मगर टूटा है दिल मेरा
बजी है जब से शहनाई तड़ उट्ठा है दिल मेरा
सुहैल सानी
नज़्म
फेंकू राम को ख़ूब आता है तिल को ताड़ बनाना
रस्सी को वो साँप बना दें और ज़र्रे को तारा
मेहदी प्रतापगढ़ी
नज़्म
जब कि थी हम में भी ऐसे ज़ोर-ओ-ताक़त की नुमूद
हेच थी दीवान रोएँ तन की जिस से हस्त-ओ-बूद
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
नज़्म
आपा के बस्ते में हम चुपके से मिट्टी भर दें
अब्बा की छतरी को जो हम तोड़ के चर मर कर दें
उजागर वारसी
नज़्म
रिप्पो को मारी टक्कर सीढ़ी पे चढ़ते चढ़ते
मम्मी के हाथ में था जो गिर गया वो तड़ से
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
नज़्म
वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा