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नज़्म
वो मिरी हसरत-ए-देरीना का शहबाज़-ए-जलील
कितनी मुद्दत में बिल-आख़िर तह-ए-दाम आया है
जगन्नाथ आज़ाद
नज़्म
सुब्ह-दम बाद-ए-सबा की शोख़ियाँ काम आ गईं
लाला-ओ-गुल को बग़ल-गीरी का मौक़ा मिल गया
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
आज तो हम बिकने को आए, आज हमारे दाम लगा
यूसुफ़ तो बाज़ार-ए-वफ़ा में, एक टिके को बिकता है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
फ़क़ीरी में यही असबाब-ए-हस्ती था यही दर्द-ए-तह-ए-जाम-ए-तमन्ना था
यही सामाँ बचा लेते तो अच्छा था
साजिदा ज़ैदी
नज़्म
कहीं मेहर सुब्ह-ए-कमाल के
कहीं ज़ुल्फ़-ए-वस्ल-मिज़ाज पर तह-ए-गर्द-ए-हिज्र जमी हुई
अख़्तर हुसैन जाफ़री
नज़्म
जब कोई क़र्ज़ सदाक़त का चुकाने के लिए
ज़हर का दुर्द-ए-तह-ए-जाम भी पी लेता है
सुलैमान अरीब हैदराबादी
नज़्म
चप्पा चप्पा पे हैं याँ गौहर-ए-यकता तह-ए-ख़ाक
दफ़्न होगा न कहीं इतना ख़ज़ाना हरगिज़