aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "tapish-e-aa.ina"
गई बहार ज़बानों पे नाम बाक़ी हैख़याल की तपिश-ए-ना-तमाम बाक़ी है
नज़र में इक ख़लिश-ए-इंतिज़ार छोड़ गयाजिगर में इक तपिश-ए-दर्द-कार छोड़ गया
चमन को बर्फ़ की तह में नुमू की ख़्वाहिश हैहयात को तपिश-ए-आरज़ू की ख़्वाहिश है
दर्द ही दर्द हूँ फ़रियाद नहीं हूँ शायदज़ेर-ए-मिज़्गाँ तपिश-ए-आह के पिघलाए हुए
मैं पहुँच जाऊँ अगर आप मुझे याद करेंतपिश-ए-शौक़ से शो'लों की लपक से बढ़ कर
वो इश्क़ जिस की शम्अ' बुझा दे अजल की फूँकउस में मज़ा नहीं तपिश ओ इंतिज़ार का
राख कर दी तपिश-ए-इश्क़ ने सारी हस्तीएक शो'ला की तरह फिर भी लपकता हूँ मैं
आग पर भी न तुझे आह मचलते देखातपिश-ए-हुस्न को पहलू न बदलते देखा
दम-ए-विसाल निगाहों में हिज्र का मंज़रमिसाल-ए-गर्दिश-ए-आईना
मैं पस-ए-आईना हूँ
फ़सील-ए-शहर-ए-अना भी चुप हैज़बान-ए-ख़ल्क़-ए-ख़ुदा भी चुप है
हुजूम-ए-संग-ए-अना और ज़ब्त-ए-पैहम नेमिसाल-ए-रेग-ए-रवाँ बे-क़रार रक्खा है
इस ख़ामोशी की चादर कोगर्द-ए-अना से दूर रखो
इज़्ज़त۔ए-नफ़्स-ओ-अना साथ लिएबीज मेहनत के सदा बोती रही
मू-ए-'आना के नाम परमेरे खाने पीने के
पुल से नज़्मेंनज़्मों से इज़हार-ए-अना के कितने दरीचे खुल जाते हैं
बुनियाद-ए-ग़ुरूर-ओ-किब्र-ओ-अना को ठोकर से ढा देती हैतदबीर की आख़िर नाकामी तक़दीर को मनवा देती है
जो शहर-ए-अना में खड़ा सोचता हैकहाँ रात काटे कहाँ दिन बिताए
उस के होने से मेरे आँगन मेंतपिश-ए-धूप भी सुहानी है
ये तो सूरज से रौशनी ले करसूरत-ए-आइना चमकता है
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