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नज़्म
गोशा-ए-दिल में तेरा दर्द छुपाया मैं ने
चश्म-ए-तर को भी न ये राज़ बताया मैं ने
राबिया सुलताना नाशाद
नज़्म
जहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनी
जिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मीठे नग़्मे गाने वाली ओ चमन की नाज़नीं
है तर-ओ-ताज़ा हमेशा तेरा कुंज-ए-दिल-नशीं
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
मुद्दआ-ए-दिल तिरा इक गौहर-ए-उम्मीद है
जो फ़ज़ा-ए-तार में इक शोला-ए-ख़ुर्शीद है