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नज़्म
ज़िंदगी तेरी है बे-रोज़-ओ-शब-ओ-फ़र्दा-ओ-दोश
ज़िंदगी का राज़ क्या है सल्तनत क्या चीज़ है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जा-ब-जा बोर्ड पे लिक्खा है कि ख़ामोश रहो
''फ़िक्र-ए-फ़र्दा न करो महव-ए-ग़म-ए-दोश रहो''
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
द्वारका-धीश कहीं बन के मुकुट सर पे रखा
काली कमली रही जंगल में सर-ए-दोश कहीं
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
गले घुटते हैं या फिर टूटती हैं फाँसियाँ देखें
सर-ओ-दोश इक तरफ़ दार-ओ-रसन की आज़माइश है
फ़ज़लुर्रहमान
नज़्म
पढ़ने का ग़म है इन को न है इन को फ़िक्र-ए-दोश
हर वक़्त खेलते हैं पढ़ाई का किस को होश