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नज़्म
जहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनी
जिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इस शाम-ए-ख़िज़ाँ ने अब तक तो हर तरह से पर्दा-दारी की
जब सुब्ह-ए-बहार आ जाएगी ऐ तंगी-ए-दामाँ क्या होगा
माहिर-उल क़ादरी
नज़्म
रात भर मैं ने आँखें भिगोई हैं कूज़ों में और सुब्ह-दम
हल्क़ को तर किया आँसुओं से बहुत
इशरत आफ़रीं
नज़्म
मला चेहरे पे दिन के किस तरह ग़ाज़ा तबस्सुम का
सिए हैं ज़ख़्म किस-किस तरह से बे-ख़्वाब रातों के
बशर नवाज़
नज़्म
'ऐन मुमकिन है कि दुनिया तुम्हें अफ़्साना कहे
पर हक़ीक़त की तरह मुझ पे हुवैदा तुम हो
ज़ुबैर अहमद सानी
नज़्म
इस तरह से विज्दान के होंटों पे है नाला
जैसे कोई पा-बस्ता मुसाफ़िर सर-ए-राहे