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नज़्म
हूरें आ कर ख़ुल्द से तौफ़-ए-मज़ार-ए-पाक को
झाड़ती पलकों से हैं गर्द-ओ-ख़स-ओ-ख़ाशाक को
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
न ज़ौक़-ए-जाम-ओ-मय-कदा न बुत-कदे की आरज़ू
न तौफ़ कू-ए-यार का न हसरतें न जुस्तुजू
क़ैसर अमरावतवी
नज़्म
फ़िक्र से झुक जाए वो गर्दन तुफ़ ऐ लैल ओ नहार
जिस में होना चाहिए फूलों का इक हल्का सा हार
जोश मलीहाबादी
नज़्म
सामने दुनिया के तुफ़ करते हैं तेरे नाम पर
ख़ल्वतों में जो तिरे क़दमों पे रख देते हैं सर
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
तुम आज फिर उस हिमाला से टकरा कर बरसना चाहती हो......
तुफ़ है तुम्हारी दीवानगी पर!